तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५५ तिरुक्कुरळ 135
५५. सुशासन
५४१. नीति यही है कि ध्यान से विचार कर दाक्षिण्य के बिना
मध्यस्थता के साथ किसी के कर्म पर न्याय किया जाय ।
५४२. सम्पूर्ण संसार वर्षा पर दृष्टि रखकर जीवित है, और प्रजा सम्राट्
के राजदण्ड ( सुशासन ) पर ।
५४३. ब्राह्मण के ग्रन्थ एवं धर्म का मूल आश्रय है सम्राट्
का राजदण्ड ।
५४४. सप्रेम प्रजा पर सुशासन करनेवाले विशाल राज्य के सम्राट् के
सहारे ठहरता है सम्पूर्ण संसार ।
५४५. नीतिबद्ध सुशासन करनेवाले सम्राट् के प्रदेश में वर्षा एवं उपज
दोनों यथानुकूल होते हैं ।
५४६. शूल नहीं विजय प्रदान करता, अपितु सम्राट् का राजदण्ड ;
और वह भी वक्र न होने पर ही ।
५४७. सम्पूर्ण संसार की रक्षा सम्राट् करता है । वह नीतिपूर्ण
शासन करे तो वही नीति उसकी रक्षा करेगी ।
५४८. विनम्र वार्त्ता सहित विचारपूर्वक सुशासन न करनेवाला सम्राट्
दीन अवस्था में पड़कर स्वतः अधःपतन को प्राप्त होगा ।
५४९. दूसरों से प्रजा की सुरक्षा करके उनके दोषों पर दण्ड देना
सम्राट् का कर्म है, कलंक नहीं ।
५५०. सम्राट् का घातकों को मृत्यु-दण्ड देना खेती की उपज की
रक्षा करके व्यर्थ के घास-फूस को उखाड़ फेंकने के समान है ।