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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 334 में से

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पृष्ठ 158

अध्याय ५४ तिरुक्कुरळ 133
५४. अविस्मरण
५३१. अत्यधिक आनन्द में (विस्मरण के कारण) उत्पन्न असावधानी
असीम क्रोध से अधिक हानिकारक होती है ।
५३२ बुद्धि निरन्तर दारिद्र्य से कुण्ठित पड़ जाती है । उसी प्रकार
विस्मरण यश को कुण्ठित कर देता है ।
५३३. इस संसार में विस्मरणशील व्यक्ति के लिए यशस्वी जीवन नहीं
है । सभी ग्रन्थकारों का यही निश्चित मत है ।
५३४. भयग्रस्तों को सुदृढ़ गढ़ प्रयोजनहीन है; इसी प्रकार विस्मरणशील
को सुअवसर ।
५३५. पहले से ही अपनी रक्षा न करनेवाला विस्मरणग्रस्त अपने दोष
का विचार करके विपत्ति के आ पड़ने पर विलाप करेगा ।
५३६. विस्मरण के कारण कभी किसी की पकड़ में न आने के समान
गुण और कोई नहीं है ।
५३७. अविस्मरण के शस्त्र के साथ अपने कर्मों को ध्यान से कोई करे
तो उसके लिए असम्भव कुछ नहीं होता ।
५३८. (बुद्धिमानों से) प्रशंसित कर्मों को ध्यान से करना चाहिए ।
विस्मरण के फलस्वरूप ऐसा न करे तो सात जन्मों में उसे कोई
सफलता नहीं सिद्ध हो सकती ।
५३९. अपने आनन्द में सगर्व मस्त रहते समय विस्मरण से विनाश को
प्राप्त व्यक्ति का विचार करो ।
५४०. इच्छित वस्तु की प्राप्ति सरल होगी यदि उसका ध्यान सतत
बना रहे ।