तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५३ तिरुक्कुरळ 131
५३. बन्धुओं की उपेक्षा न करना
५२१. किसी की दरिद्रता में भी उसे छोड़े बिना पुराना सम्बन्ध
बनाये रखना बन्धुओं में ही होता है।
५२२. अटूट प्रेम से युक्त बन्धुवर्ग किसी को प्राप्त हो तो वह निरन्तर
विकासोन्मुख सौभाग्य अनेकानेक रूपों में प्रदान करेगा।
५२३. बन्धुओं के साथ मिलनसार न होनेवाले का जीवन तट रहित फैले
हुए सजल तालाब के समान होता है।
५२४. धनवान की धन-प्राप्ति का प्रयोजन बन्धु-जनों को साथ मिलाये
रखने के सद्व्यवहार में है।
५२५. कोई दानी एवं मधुर वक्ता हो तो वह निकट सम्बन्धियों से
घिरा रहेगा।
५२६. बड़ा दानी एवं निष्क्रोधी कोई हो तो उसके समान बन्धुवर्ग प्राप्त
व्यक्ति संसार में और कोई नहीं होगा।
५२७. कौवा (प्राप्त वस्तु को) छिपाये बिना पुकार कर (अपने अन्य
बन्धुओं सहित) ही खाता है। श्रीवृद्धि भी ऐसे स्वभाववाले
को ही सिद्ध होती है।
५२८. सम्राट् सभी को एक ही समान न देखकर योग्यता का
यथोचित विचार रक्खे तो उसे अनेक लाभ प्राप्त होंगे।
५२९. बन्धु बन कर फिर (किसी कारणवश) स्वयं सम्बन्ध विच्छेद कर
बैठे हों तो उनका पुनः सम्मिलन उस विच्छेदन के कारण की
समाप्ति के पश्चात् स्वतः होगा।
५३०. अलग होने पर सकारण आनेवाले को सम्राट्, यथानुकूल
... देकर सावधानी के साथ अपने संग मिलावे।