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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 334 में से

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पृष्ठ 154

अध्याय ५२ तिरुक्कुरळ 129
५२. समझकर कर्म कराना
५११. शुभाशुभ की समीक्षा करके शुभ कर्म में प्रवृत्त होनेवाला ही
अधिकारी हो सकता है ।
५१२. आय को बढ़ाकर स्थाई सम्पत्ति की वृद्धि करके आनेवाली
बाधाओं को (पहले ही से) समझकर हटानेवाला ही (उसकी
सुरक्षा के भार को उठाने के) कर्म में प्रवृत्त होवे ।
५१३. स्नेह, बुद्धि, निश्चलता, निर्लोभिता—इन चारों शुभ-गुणों से
पूर्णतः युक्त जो हो उसी में निष्पक्ष निर्णयात्मकता होती है ।
५१४. सभी प्रकार की समीक्षा के पश्चात् किसी विशिष्ट निर्णय पर
भी कार्य-प्रणाली के कारण विभिन्न दिशाओं में चलनेवाले व्यक्ति
अनेक होते हैं ।
५१५. बुद्धि से काम लेकर बाधाओं को सहकर कर्म को पूर्ण
करनेवाले के अतिरिक्त किसी दूसरे को श्रेष्ठ मानकर कोई कर्म
न सौंपना चाहिए ।
५१६. कर्म तथा उसे करनेवाले का परिशीलन करके अनुकूल समय का
विचार रखकर कर्म में प्रवृत्त होना चाहिए ।
५१७. यह कार्य इस साधन द्वारा अमुक व्यक्ति कर सकेगा या नहीं—
इसका परिशीलन करके ही किसी पर कोई काम छोड़ना
चाहिए ।
५१८. अमुक व्यक्ति कर्म का अधिकारी है या नहीं, इसका परिशीलन
करने के पश्चात् ही उसे उसका अधिकारी बनाना चाहिए ।
५१९. किसी के अपने कर्म में सप्रयत्न रहने के अधिकारपूर्ण स्वत्व का
(उसका शासक) विपरीत अर्थ लगावे तो उससे भाग्य-लक्ष्मी
पृथक हो जाती है ।
५२०. प्रतिदिन सम्राट् उस कर्मचारी (की सुरक्षा) का विचार
रक्खे जिसके टेढ़ा न पड़ने तक लोक व्यवहार भी टेढ़ा
नहीं पड़ता ।
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