तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५० तिरुक्कुरळ् 125
५० स्थल का बोध
४९१. कार्यपूर्ति (व्यूह) के लिए उचित स्थल को ढूँढ़ निकाले बिना
किसी कर्म में (युद्ध में) प्रवृत्त न होवो; शत्रु को भी क्षुद्र
मत मानो (उसकी निन्दा न करो)।
४९२. विरोधी-भाव युक्त सबल व्यक्ति के लिए भी दुर्ग की यथावत् रक्षा
अनेक प्रकार के लाभ प्रदान करेगी।
४९३. स्थल कों समझकर अपनी रक्षा करते हुए शत्रु पर आक्रमण
करें तो निर्बल भी सबल के जैसे विजयी होंगे।
४९४. अनूकूल स्थल को समझकर दृढ़ता के साथ जो कार्य में प्रवृत्त
होवे उस पर विजय प्राप्त करने का विचार रखनेवाले अपनी
कामनापूर्ति में असफल होंगे।
४९५. गहरे जल में मगर अन्य जीवों पर विजयी होता है, परन्तु
जल के बाहर उस मगर पर भी अन्य जीव विजयी होते हैं।
४९६. बृहद् चक्रों से युक्त बड़े रथ समुद्र पर नहीं चल सकते।
समुद्र-गामी जलयान भी पृथ्वी पर नहीं चल सकते।
४९७. पूर्णतः विचार करके उचित स्थान से कर्म में प्रवृत्त होवो
तो निर्भयता के अतिरिक्त अन्य किसी की सहायता
आवश्यक नहीं।
४९८. अल्प सैन्यवाला अपने लिए उपयुक्त स्थल पर पहुँचकर डट
जाय तो बृहद् सैन्यवाले का उत्साह नष्ट हो जायगा।
४९९. दुर्ग-विशेष तथा अन्य विशिष्ट साधन किसी के पास
न होने पर भी उसकी ही भूमि पर उस पर आक्रमण करना
दुष्कर होता है।
५००. भालों से युक्त वीरों को छेदनेवाले लम्बे दाँतों से युक्त
निडर हाथी को उसके पांव को फँसानेवाले कीचड़ में
गीदड़ भी मार डालेंगे।