तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४७ तिरुक्कुरळ 119
४७. बोधयुक्त कर्म
४६१. वस्तु-नाश और व्यय के अनन्तर प्राप्य लाभ का भी विचार
करके किसी कर्म में प्रवृत्त हो ।
४६२. परिचित बंधुओं के साथ समझ-बूझकर क्रियाशील होनेवाले
व्यक्तियों के लिए असम्भव वस्तु कुछ नहीं है ।
४६३. अत्यधिक लाभ के लोभ से मूलधन को खो बैठने के कर्म में
बुद्धिमान प्रवृत्त नहीं होंगे ।
४६४. अपयश-प्रद दोष से डरनेवाले उस कर्म का आरम्भ नहीं
करेंगे जिसमें लाभ स्पष्ट न हो ।
४६५. विभिन्न परिस्थितियों का विचार किये बिना आक्रमण करना शत्रु
को सुदृढ़ भूमि प्रदान करने का एक मार्ग है ।
४६६. अनुचित कर्मों के करने से तथा उचित कर्मों के न करने से
भी मनुष्य की अधोगति होगी ।
४६७. सोच विचार कर कर्म में प्रवृत्त हो । प्रवृत्त होने के पश्चात्
सोच विचार करना मूढ़ता है ।
४६८. उचित उपाय से न किया हुआ प्रयास अन्य अनेक व्यक्तियों का
आश्रय प्राप्त होने पर भी व्यर्थ ही जायगा ।
४६९. यदि तुम किसी के स्वभाव को समझकर उसके अनुकूल
कर्म न करोगे तो भला करने पर भी उससे बुरा सम्भवित
होगा ।
४७०. लोकानुकूल कर्म करो, क्योंकि अपने लिये प्रतिकूल कर्म को लोक
अंगीकार नहीं करेगा ।