तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४६ तिरुक्कुरळ 117
४६. कुसंग का त्याग
४५१. श्रेष्ठता कुसंग से डरती है। नीचता ही उसे बन्धु मानकर उससे
घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित कर देती है।
४५२. भूमि के गुण से जल में परिवर्तन आ जाता है। मनुष्य भी
संग के गुण के अनुकूल बुद्धि प्राप्त करता है।
४५३. मनुष्य का अनुभव मन पर आधारित है। 'यह मनुष्य ऐसा है,
यह कथन उसके संग पर आधारित है।
४५४. मनुष्य की बुद्धि जो उसके अपने मन में उपस्थित-सी प्रतीत
होती है, वस्तुतः उसके संग की ही (उपज) है।
४५५. मन एवं कर्म दोनों की शुद्धता संग की शुद्धता पर ही
अवलम्बित है।
४५६. शुद्ध मनवालों के पश्चात् शुभ (नाम व यश आदि) ही शेष
रहता है। शुद्ध संगवालों का कोई भी कर्म अशुभ
नहीं होता।
४५७. मन की पवित्रता मानव का वैभव है। संग की विशुद्धता
सकल सुयश प्रदान करती है।
४५८. मन पूर्णतः पवित्र होने पर भी बुद्धिमान के लिए संग की
पवित्रता विशिष्ट सहायक शक्ति होती है।
४५९. मन की पवित्रता से स्वर्ग-सुख प्राप्त होता है, और वह संग की
पवित्रता से श्रेष्ठतर बनता है।
४६०. अच्छे संग से बढ़कर कोई सहायक नहीं होता, और कुसंग से
बढ़कर अहितकर शत्रु भी कोई नहीं होता।