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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 334 में से

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पृष्ठ 140

अध्याय ४५ तिरुक्कुरळ 116.
४५. श्रेष्ठों का साहचर्य
४४१. धर्मज्ञ व अपने से बड़े ज्ञानी पुरुषों की मित्रता उनकी महानता को
समझकर यथानुसार प्राप्त करो।
४४२. आये हुए दुःख को दूर करके भविष्य के दुखों को
भी रोकते हुए पहले से ही रक्षा करने की योग्यता रखनेवाले
व्यक्ति का सम्मान करके उनसे साहचर्य स्थापित करो।
४४३. श्रेष्ठ व्यक्ति का सम्मान करके उन्हें अपना बना लेना
दुर्लभ पदार्थों से दुर्लभ है।
४४४. अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति का अपना होकर रहना सभी शक्तियों में
श्रेष्ठ है।
४४५. मन्त्री ही नेत्र के समान होने के कारण नृपति को चाहिए कि ध्यान
से विचार करके उनका चुनाव करे।
४४६. जिसे योग्य व श्रेष्ठ व्यक्तियों के साहचर्य का बल प्राप्त होगा,
उसे शत्रु द्वारा किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँच सकती।
४४७. (दोषों को सूचित करते हुए) डाँटनेवाले सहचर के आदेशानुसार
चलनेवाले को कोई कैसे हानि पहुँचा सकता है?
४४८. डाँटनेवाले सहचर से रहित निराश्रय नृपति का नाश शत्रुओं के
अभाव में भी अवश्यम्भावी है।
४४९. मूलधन न हो तो लाभ अप्राप्य होता है। सबल सहायक का
आश्रय न हो तो स्थायित्व अप्राप्य होता है।
४५०. सज्जनों की मैत्री का त्याग अनेक व्यक्तियों की शत्रुता से
दस गुना हानिप्रद होता है।