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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 334 में से

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पृष्ठ 136

अध्याय ४३ तिरुक्कुरळ 111
४३. बुद्धिमत्ता
४२१. बुद्धि विध्वंस से रक्षा करनेवाला साधन है, और शत्रुओं से भी
नष्ट न होनेवाला सुदृढ़ दुर्ग है।
४२२. सभी इच्छित स्थानों पर मन को जाने से रोक कर अशुभ से
हटा कर शुभ मार्ग की ओर प्रवृत्त करना बुद्धिमत्ता है।
४२३. कोई विषय चाहे किसी से सुनें, (उसे उसी रूप में न मान कर)
उसमें सत्य को निरखना बुद्धिमत्ता है।
४२४. दूसरों के समझने योग्य सरल रूप में अपने विचारों को व्यक्त
करके, दूसरों के शब्दों में गम्भीर तत्वों को निरखना बुद्धिमत्ता
है।
४२५. लोक को मित्र बनाना बुद्धिमत्ता है। उस मित्र के सम्मुख
पुष्पित होना और पीछे सम्पुटित न होना बुद्धिमत्ता है।
४२६. जैसा व्यवहार लोक में हो, उसके साथ उसी प्रकार का व्यवहार
करना बुद्धिमत्ता है।
४२७. बुद्धिमान भविष्य का ज्ञान रखता है। बुद्धिहीन उस प्रकार का
ज्ञान नहीं रखता।
४२८. जिससे डरना चाहिये उससे निडर रहना बुद्धिहीनता है, और
डरना ही बुद्धिमान का कार्य है।
४२९. भावी की रक्षा कर लेनेवाले बुद्धिमानों पर प्रकंपित करने
वाली कोई विपत्ति नहीं आ सकती।
४३०. बुद्धिमान (के पास और कुछ न होने पर भी) सर्व-सम्पन्न होते
हैं। बुद्धिहीन के पास चाहे कुछ भी हो, वे कंगाल ही हैं।