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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

अध्याय ४२ तिरुक्कुरळ 109
४२. श्रवण
४११. सम्पत्तियों में मूल्यवान है श्रवण (से प्राप्त ज्ञान) की सम्पत्ति।
वही सम्पत्ति सब सम्पत्तियों से श्रेष्ठ है।
४१२. कर्णों को आहार अप्राप्य हो तो उस समय (उसके हेतु
शरीर को बनाये रखने के लिए) तनिक पेट को भी
आहार दिया जायगा।
४१३. कर्ण-आहार रूपी 'श्रवण' (ज्ञान) से सम्पन्न व्यक्ति पृथ्वी पर
रहने पर भी हवि का भोग करनेवाले देवताओं के समान हैं।
४१४. शिक्षित न होने पर भी शिक्षितों के वचनों को सुनो।
वह शैथिल्य के समय आधार-दण्ड के समान सहायक
होगा।
४१५. सच्चरित्र के मुख से निकलनेवाले शब्द फिसलन पर चलते समय
आधार-दण्ड के समान (जीवन में सहायक) होते हैं।
४१६. कोई छोटा हो तो भी उसकी अच्छी बातें सुननी चाहिए।
वे भी (समय पर) विशिष्ट गौरव प्रदान करेंगी।
४१७. सूक्ष्म निरीक्षण के साथ श्रवण करके ज्ञान संचित किये हुए
व्यक्ति भ्रम होने पर भी बुद्धिहीन शब्द न निकालेंगे।
४१८. श्रवण (ज्ञान) से जो कर्ण वेधित न हुए हों वे सुनने
पर भी बहरे स्वभाववाले ही हैं।
४१९. सूक्ष्म श्रवण से वंचित व्यक्ति नम्र भाषी नहीं हो सकते।
४२०. श्रवण-माधुर्य के अनुभव के बिना केवल मुख-माधुर्य में लिप्त
मनुष्य मरें तो क्या ? जियें तो क्या ?