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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 334 में से

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पृष्ठ 128

अध्याय ४० तिरुक्कुरळ 105
४०. शिक्षा
३९१. पठनीय विषयों का निर्दोष अध्ययन करें। तदनन्तर उसके
अनुसार व्यवहार करने में स्थिर रहें।
३९२. अंक और अक्षर कहलानेवाले ये दोनों जीवित प्राणिमात्र के
नेत्र कहलाते हैं।
३९३. जो शिक्षित हैं वे ही आँखोंवाले हैं। अशिक्षित तो केवल
आनन पर दो ज़खम लिये हुए हैं।
३९४ विद्वान का कर्म इतना ही है कि उसका आनन्दप्रद मिलन
बिछुड़ते समय मन में यह व्यथा उत्पन्न कर दे कि फिर न जाने
कब मिलेंगे।
३९५. धनवान के सम्मुख निर्धन के समान अति दीन भाव से
झुके रहने पर भी शिक्षित ही श्रेष्ठ हैं, और अशिक्षित सदा
निम्न ही होंगे।
३९६. पृथ्वी में कुँआ जितना ही गहरा खुदेगा उतना ही अधिक जल
निकलेगा। वैसे ही मानव में जितनी ही शिक्षा अधिक होगी
उतनी ही बुद्धि तीव्र बनेगी।
३९७. शिक्षित के लिए सभी देश और सभी नगर अपने बन जाते हैं।
अतः कोई आमरण अशिक्षित क्यों बना रहता है?
३९८. एक जन्म के स्वाध्ययन से प्राप्त शिक्षा सात जन्मों तक उसकी
सहायता करती है।
३९९. अपने लिए आनन्दप्रद 'शिक्षा' से ही संसार को भी आनन्दित
देखकर बुद्धिमान उसके अधिकाधिक उपार्जन की इच्छा करेंगे।
४००. अनश्वर महान सम्पत्ति 'शिक्षा' ही है। किसी के लिए अन्य
कोई विषय ऐसा श्रेष्ठ नहीं है।