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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 334 में से

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पृष्ठ 122

अध्याय ३८ तिरुक्कुरळ् 99
४. भाग्य
३८. भाग्य
३७१. धन-प्राप्ति के (सौ) भाग्य से परिश्रम प्रकट होता है, और विसर्जन के
(दुर) भाग्य से आलस्य ।
३७२. धन खोने का दुर्भाग्य मनुष्य को मन्द बुद्धि, और धनोपलब्धि का
सौभाग्य उसे विशाल बुद्धि बना देगा।
३७३. अनेक गम्भीर ग्रन्थों का अध्ययन करने पर भी मनुष्य की
भाग्यानुकूल वास्तविक बुद्धि ही प्रधान रहती है।
३७४ (भाग्य के फलस्वरूप) संसार का स्वभाव दो प्रकार का है।
एक है सम्पत्ति-सम्पन्नता और दूसरा है सद्ज्ञान-सम्पन्नता।
३७५. धन-संग्रह का प्रयास (भाग्य के फलस्वरूप) सद् को असद् और
असद् को सद् प्रतीत कराता है।
३७६. भाग्य में कोई वस्तु न हो तो उसकी कितनी ही रक्षा क्यों न
की जाय नहीं ठहरेगी, और भाग्य में हो तो निकाल बाहर
फेंकने पर भी नहीं जावेगी।
३७७. भाग्य के विभाजन के प्रतिकूल कोई करोड़ों वस्तुओं का संग्रह
करने पर भी उनका उपभोग नहीं कर सकता।
३७८. भाग्य के फलस्वरूप उपस्थित बाधाएँ मानव को बाधित न
करें तो उपभोग्य वस्तुओं से रहित व्यक्ति सन्यास धारण
कर लेंगे।
३७९. सौभाग्य के समय सानन्द प्रतीत होनेवाले दुर्भाग्य के समय
दुखित क्यों हों ?
३८०. भाग्य से बढ़कर शक्ति कौन-सी है ? कोई दूसरी शक्ति इसे
घेरे तो भी यही (अधिक सबल होकर) उसके आगे आ
उपस्थित होता है।