तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३७ तिरुकुरळ 97
३७. तृष्णा-दमन
३६१. तृष्णा वह बीज है जो सभी जीवों को सभी कालों में निरन्तर
जन्म-मरण में डाले रहता है ।
३६२. इच्छा रखनी ही है तो पुनः जन्म न लेने की इच्छा रखनी
चाहिए ।
३६३. अनिच्छा के समान अति श्रेष्ठ सम्पत्ति इस संसार में नहीं है ।
अन्यत्र भी उसके तुल्य वस्तु अप्राप्य है ।
३६४. पवित्रता कहते हैं अतृष्ण अवस्था को । वह (परमार्थ रूपी)
सत्य की अभिलाषा करने पर (स्वतः) प्राप्त होती है ।
३६५. मुक्त पुरुष तृष्णा रहित व्यक्ति ही होते हैं । अन्य व्यक्ति
उतने मुक्त नहीं होते ।
३६६. तृष्णा से भय खाना धर्म है क्योंकि वही दूसरों पर कपट
व्यवहार करानेवाली है ।
३६७. तृष्णा का पूर्ण दमन कर दें तो इच्छित मुक्ति-पद स्वतः सिद्ध
हो जायगा ।
३६८. अतृष्ण व्यक्ति से सभी दुःख दूर हट जायेंगे और सतृष्ण
व्यक्ति पर दुःख बढ़ते जायेंगे ।
३६९. दुःखों में तृष्णा नामक महान दुःख का दमन हो जाय तो
निरन्तर सुख व्याप्त हो जाय ।
३७०. अतृप्त स्वभाववाली तृष्णा का दमन हो जाय तो वह स्थिति ही
स्थाई आनन्दावस्था प्रदान करेगी ।