तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३६ तिरुक्कुरळ 95
३६. तत्व-ज्ञान
३५१. अस्थाई वस्तुओं को स्थाई वस्तु मानने के विपरीत ज्ञान के कारण
जीव दुखद जन्म-मरण में फँसता है।
३५२. अज्ञान से मुक्त व निर्मल तत्व-ज्ञान के पारखी के सामने से
अन्धकार हट जाता है और उसे स्थाई आनन्द प्राप्त होता है।
३५३. भ्रम-मुक्त व तत्व-ज्ञान प्राप्त व्यक्ति के समीप पृथ्वी-लोक से
अधिक देव-लोक होता है।
३५४. तत्व-ज्ञान न हो तो पाँचों प्रकार के ज्ञान को प्राप्त करनेवाली
इन्द्रियाँ भी निष्प्रयोजन ही हैं।
३५५. कोई वस्तु कैसी ही क्यों न प्रतीत हो, उसके वास्तविक तथ्य को
समझना ही ज्ञान कहलाता है।
३५६. आवश्यक अध्ययन के अनन्तर तत्व-ज्ञान को प्राप्त व्यक्ति पुनः
इस संसार में न आने के मार्ग के अनुगामी बनेंगे।
३५७. कोई स्वयं मन में समीक्षा करके तत्व-ज्ञान प्राप्त कर ले तो समझ
लो कि उसका पुनः जन्म न होगा।
३५८. भव-पीड़ा के आधारभूत 'अज्ञान' के हटने के लिए मोक्ष-प्राप्ति के
आधारभूत तत्व के दर्शन को ही 'ज्ञान' कहते हैं।
३५९. सब पदार्थों के आधारभूत तात्विक वस्तु का ज्ञान प्राप्त कर कोई
बन्धन-मुक्त होने का प्रयत्न करे तो जन्म-मरण के आधारभूत
दुःख उसे नहीं सतायेंगे।
३६०. 'काम, क्रोध, मोह' इन तीनों के नामों का भी मन में नाश कर
देने से भव-दुःख का स्वतः नाश हो जायगा।