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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 334 में से

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पृष्ठ 116

अध्याय ३५ तिरुक्कुरळ 93
३५. सन्यास
३४१. जिन-जिन वस्तुओं से मानव बन्धन-मुक्त हो जाता है उन-उन
वस्तुओं से उसे दुःख नहीं होता ।
३४१. सुख की इच्छा हो तो सभी वस्तुओं के होते हुए उनसे मुक्ति
प्राप्त करो । फिर यहीं अनेक प्रकार के सुख सिद्ध होंगे ।
३४३. पंचेन्द्रियों की वासनाओं का संहार करना चाहिए, और उनकी
आधारभूत सभी वस्तुओं का एक साथ परित्याग भी आवश्यक है ।
३४४. किसी प्रकार का बन्धन न होना तपस्या का स्वभाव है, और
बन्धनयुक्त होना तपस्या से हटकर वासना के वशीभूत होने का
साधक होता है ।
३४५. अन्य बन्धन क्यों मोल लेते हो ? जन्म-मरण के दुःख से मुक्ति
चाहनेवाले को शरीर-बन्धन ही बड़ा दण्ड स्वरूप है ।
३४६. 'मै', 'मेरा' के अहंकार का जो दमन कर डाले वह देवताओं
से श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करेगा ।
३४७. बन्धन-युक्त व्यक्ति को विविध प्रकार के दुःख बाँध कर उसे कभी
मुक्त न करेंगे ।
३४८. पूर्णतः सन्यास ग्रहण करनेवाले ही श्रेष्ठ बनते हैं । इतर व्यक्ति
अज्ञान के जाल में फँस कर बेबस पड़े रहते हैं ।
३४९. बन्धन-मुक्त होने पर ही भव से मुक्ति प्राप्त होगी । अन्यथा
( जन्म-मरण की ) अस्थिरता बनी रहेगी ।
३५०. सर्वथा बन्धन-मुक्त परमेश्वर से अपना बन्धन स्थापित करो ।
अन्य बन्धनों से मुक्त होने के हेतु इस बन्धन को
बनाये रक्खो ।