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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

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पृष्ठ 112

अध्याय ३३ तिरुक्कुरळ 89
३३. अहिंसा
३२१. धार्मिक कर्म कौन-सा है ? अहिंसा। हिंसा सभी अन्य
(विपरीत) कर्मों को ला देती है।
३२२. बाँट कर स्वयं भी भोजन करके अनेक जीवों की रक्षा करना
ग्रन्थकारों द्वारा धर्मों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
३२३. धर्मों में अतुलनीय अग्रिम स्थान अहिंसा का है। उसके
अनन्तर 'असत्य न बोलना' उचित है।
३२४ 'सन्मार्ग' वह कहलाता है जिसमें किसी जीव की हिंसा न
करने के धम की प्रधानता हो।
३२५. जीवन की स्थिति से भयभीत हो सन्यास ग्रहण करनेवाले सबों से,
हिंसा से भयभीत हो अहिंसा की रक्षा करनेवाला श्रेष्ठ है।
३२६. अहिंसा के आधार पर जीवन व्यतीत करनेवाले की आयु पर
प्राण-भक्षक यम का भी वश नहीं चल सकता।
३२७. चाहे अपने प्राण ही जायं, पर स्वयं दूसरे के प्राण को हरने की
क्रिया न करनी चाहिए।
३२८. महान वृद्धि की शुभ-प्राप्ति होने पर भी, हिंसा से प्राप्त वृद्धि
बुद्धिमानों को अति अशोभायमान ही होती है।
३२९. हिंसा करनेवाले (निर्दय) लोग समझदारों से मन में अति
नीच माने जायेंगे।
३३०. रोगी शरीर व दरिद्र दुर्जीवन व्यतीत करनेवालों ने (ज्ञानी
कहते हैं) पूर्वतः जीवों के शरीर से प्राणों को पृथक किया होगा।
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