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सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 334 में से

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पृष्ठ 110

अध्याय ३२ तिरुक्कुरळ 87
३२. बुरा न करना
३११. यशप्रद सम्पत्ति की प्राप्ति होने पर दूसरों का बुरा न करना
निष्कलंक व्यक्ति का सिद्धान्त होता है।
३१२. बैर भाव से किसी के बुरा करने पर भी बदले में उसका बुरा
न करना निष्कलंक व्यक्ति का सिद्धान्त होता है।
३१३. अकारण बुरा करनेवाले का भी (बदले में) बुरा करने पर
(वह कर्म) अपार दुःख देगा।
३१४. बुरा करनेवाले का (समुचित) दण्ड है उसे लज्जित करते हुए
उसका भला करके (उसकी बुराई और अपनी भलाई को) भूल
जाना।
३१५. दूसरों के दुःख को अपने दुःख के समान मानकर उनकी रक्षा
न की तो ज्ञान का क्या उपयोग?
३१६. किसी कर्म को स्वयं बुरा समझने पर उसे दूसरे पर करने का
विचार न करना चाहिए।
३१७. मन में उत्पन्न कुत्सित कर्मों को, चाहे वे कितने ही साधारण क्यों
न हों, किसी समय किसी पर भी न करना ही श्रेष्ठ है।
३१८. अपने लिए बुरे कर्मों को समझनेवाला, न मालूम किस कारण से
दूसरों का बुरा करता है?
३१९. कोई प्रातःकाल में दूसरों का बुरा करे तो उस पर सायंकाल में
बुरा स्वयं आ पड़ेगा।
३२०. सभी दुःख दुखद कर्म करनेवालों पर ही जा पड़ते हैं। दुःख
रहित जीवन के इच्छुक दुखद कर्म करेंगे ही नहीं।