सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 334 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108

अध्याय ३१ तिरुक्कुरळ 85
३१. क्रोधित न होना
३०१. अपने क्रोध का जिस पर प्रभाव पड़ सके उस पर (अर्थात्
अपने से छोटे पर ) क्रोधित न होने का संयम ही क्रोध का
वास्तविक शमन है, और अन्य परिस्थितियों में (अर्थात् अपने से
बलवान पर ) उसका संयम करो तो क्या, और न करो तो क्या ?
३०२. असफल होनेवाले स्थान में क्रोधित होना बुरा है। सफल
स्थान में (दुर्बल पर) भी क्रोधित होने से अधिक कुत्सित और
कुछ नहीं है ।
३०३. किसी पर भी अवस्थित क्रोध को भूल जाना चाहिए । उस क्रोध
से ही बुरे कर्म उत्पन्न होंगे ।
३०४. मुख की हँसी और आन्तरिक आनन्द को नाश करनेवाले क्रोध से
बढ़कर किसी का कोई और भी शत्रु हो सकता है ?
३०५. कोई स्वयं अपनी रक्षा करना चाहे तो क्रोध से रक्षा करे ।
अन्यथा क्रोध ही उसको मार डालेगा ।
३०६. साथ लगनेवाले का संहार करनेवाली क्रोधाग्नि बन्धुत्व रूपी
आनन्द की डेंगी को भी भस्मीभूत कर देगी ।
३०७. ( अपने बल को व्यक्त करने के हेतु ) धरती को अपने हाथ से
मारनेवाले पर लगनेवाली चोट के समान क्रोध को भी एक वस्तु
माननेवाले का नाश हुए बिना रह नहीं सकता ।
३०८. लपटों से युक्त अग्नि के जलने के समान भी यदि कोई बुरा कर
दे तो उस पर भी, हो सके तो, क्रोधित न होना अच्छा है ।
३०९. -मन में क्रोध को स्थान न दो तो सभी इच्छित वस्तुओं की तुरन्त
प्राप्ति होगी ।
३१०. क्रोधान्ध मरे हुओं के समान, तथा निष्क्रोध मुक्त-पुरुषों के समान
होते हैं ।