तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३० तिरुक्कुरळ ४४
३०. सत्य बोलना
२९१. किसी प्रकार की हानि से रहित कथन को सत्य बोलना
कहते हैं।
२९२. दोष को हटाकर उपकार सिद्ध हो तो असत्य कथन भी
सत्य बोलने के समान होता है।
२९३. स्वयं जानते हुए झूठ न बोलो, अन्यथा झूठ सिद्ध होने पर अपना
हृदय ही अपने को जलायेगा।
२९४. मनुष्य अपने ज्ञान तक मिथ्या भाषण से दूर रहे तो संसार के
सभी व्यक्तियों के हृदय में स्थान प्राप्त करेगा।
२९५. मनसा-वाचा सत्य ही व्यक्त करनेवाला तपस्या के साथ दान भी
करनेवालों से श्रेष्ठ है।
२९६. असत्य वचन से रहित जीवन के समान यश और कोई नहीं है।
यह बिना उसके जाने उसे सकल धर्म प्रदान करेगा।
२९७. यदि सत्य का सदा विश्वस्त रूप से पालन करो तो अन्य धर्मों को
करने की आवश्यकता ही नहीं।*
२९८. वाह्य शुद्धि जल से सिद्ध होती है और आन्तरिक शुद्धि सत्य
बोलने से प्राप्त होती है।
२९९. (वाह्य अन्धकार को हटानेवाले) सभी दीपक दीपक नहीं हैं।
बुद्धिमानों के लिए (आन्तरिक अन्धकार को हटानेवाला) सत्य
वचन रूपी दीपक ही दीपक है।
३००. हमने वास्तव में जहाँ तक देखा है, सत्य बोलने से श्रेष्ठ विषय
अन्य कोई नहीं है।
- दूसरा अर्थ—सत्य का विश्वस्त रूप से पालन करने पर ही अन्य धर्मों को
करना लाभप्रद हो सकता है।