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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

अध्याय २९. तिरुक्कुरळ 81
२९. चोरी न करना
२८१. तिरस्कृत हुए बिना जीवन-निर्वाह की इच्छा हो तो किसी भी
वस्तु की चोरी के विचार से अपने हृदय की रक्षा करो ।
२८२. हृदय में दूषित विचार का आना भी दोष ही है। अतः
दूसरे की वस्तु को उसकी आँख बचाकर चोरी करने का विचार
भी मन में न लाओ ।
२८३. चोरी से प्राप्त वैभव विकासशील जैसा प्रतीत होकर विनाश की
ओर ले जायगा ।
२८४. चोरी से प्राप्त वस्तु का प्रेम फल-प्राप्ति के समय अमिट
दुःख देगा ।
२८५. दया समन्वित सप्रेम व्यवहार उसमें नहीं होता जो दूसरों की
वस्तु का अपहरण करने के निमित्त उस अवसर की ताक में
रहता है कि वे तनिक सुस्त पड़ें ।
२८६. चोरी से दूसरे की वस्तु का अपहरण करने के इच्छुक मितव्ययी
नहीं होते ।
२८७. चोरी नामक अन्धकारपूर्ण अज्ञान मर्यादित जीवन व्यतीत
करनेवालों में नहीं होता ।
२८८ सीमा के ज्ञान से युक्त व्यक्ति के हृदय में उपस्थित धर्म के
समान चोरी के ज्ञान से युक्त व्यक्ति के हृदय में वंचना रहती है ।
२८९. चोरी से भिन्न अन्य सद्विषयों को जो नहीं जानता उसका
पतन अमर्यादित कर्म द्वारा उसी दम होगा ।
२९०. चोरों को उनका अपना सप्राण तन भी धक्का दे देता है, और
चोरी न करनेवालों को स्वर्ग भी कभी धक्का नहीं देता ।
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