तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २८ तिरुक्कुरळ 79
२८. दुराचरण
२७१. वंचनापूर्ण हृदयवाले के दुराचरण पर शरीर के पंच-भूत उसके
अन्दर ही हँसेंगे ।
२७२ अपना मन यदि अपने ज्ञात दोषों में ही डूब जाय तो उसे
आकाश जैसे महान तपस्वी के वेश से क्या लाभ पहुँच
सकता है ?
२७३. बलहीन व्यक्ति द्वारा बलवान (तपस्वी) जैसा रूपमात्र धारण
करना, सिंह-चर्म ओढ़े भेड़ के चरने के समान ही है ।
२७४. तपस्वी का रूप धारण किये हुए दुराचरण में बरतनेवाला उस
चिड़ीमार के समान है जो झाड़ी में छिपकर जाल बिछाकर
पक्षियों को पकड़ता है ।
२७५. अपने को 'बन्धन-मुक्त' कहनेवालों का दुराचरण, उनसे ही
'हाय ! मैने क्या कर डाला !'—ऐसा कहला कर अनेक
प्रकार के दुःख देगा ।
२७६. अन्तःकरण में बन्धन-मुक्त हुए बिना ही त्यागी का ढोंग रचते
हुए जीनेवाले के समान निर्दय व्यक्ति और कोई नहीं होता ।
२७७. बाह्यतः जंगली सेब सदृश सुन्दर अरुण-वर्ण से युक्त दीखते
हुए भी हृदय के काले व्यक्ति संसार में अनेक हैं ।
२७८. पापाचार मन में रखकर परम तपस्वी के समान तीर्थों में स्नान
करके छिपे-छिपे दुष्प्रवृत्ति में लीन व्यक्ति संसार में अनेक हैं ।
२७९. रूप में बाण सीधा होने पर भी कर्म में निर्दय होता है, पर
वीणा टेढ़ी होने पर भी कर्म में मधुर होती है । इसी प्रकार
मानव को उसके आचरण से समझना चाहिए ।
२८०. संसार-निन्द्य-दुराचरण को तज दे तो बालों को मुँड़ाने व
बढ़ाने की आवश्यकता ही नहीं है ।