तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहोता। उसके दान-पुण्य में भी लौकिक प्रतिष्ठा की चाह छुपी रहती है कि लोग उसे
ऐश्वर्यशाली और परोपकारी के रूप में स्वीकार करें।”
तेनाली राम की गम्भीर वाणी थोड़ी देर तक सभाभवन में अनुगूँज उत्पन्न करती रही।
तेनाली राम के चुप होते ही महाराज ने कहा, “तेनाली राम! तुम एक मूल बात भूल रहे
हो, ईमानदारी एक मानवीय गुण है जो किसी में भी हो सकता है। इसमें धनवान और
निर्धन की कोई बात ही नहीं है।”
तेनाली राम ने कहा, “आप ठीक कह रहे हैं महाराज! बस, मैं यह कह रहा था कि गरीबों
के संघर्ष की ऊष्मा ईमानदारी की ऊष्मा के समरूप होती है। इसी ऊष्मा के कारण गरीबों
में उचित-अनुचित का ध्यान रखने की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है।“
“तो, तुम फिर वही कह रहे हो कि गरीबों में ईमानदारी होती है और धनवान, वैभव-
सम्पन्न लोगों में अपेक्षाकृत इसका अभाव रहता है?” महाराज ने पूछा।
“जी हाँ श्रीमान-यही कहना चाहता हूँ मैं।” तेनाली राम ने निर्भीक होकर कहा।
महाराज स्वयं वैभव-सम्पन्न थे इसलिए तेनाली राम की बातें उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर
ले लीं और तेनाली राम से कहा, “तुम्हें प्रमाणित करना पड़ेगा तेनाली राम!”
“मुझे स्वीकार है महाराज!” तेनाली राम ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।
सभा में जो सहजता थी, इस गम्भीर चर्चा के कारण समाप्त हो गई। महाराज ने उसी
समय सभा विसर्जित कर दी और तेनाली राम को रोककर शेष सभासदों को जाने दिया।
लौट रहे सभासदों में इसी बात की चर्चा हो रही थी कि आज महाराज तेनाली राम से
नाराज हो गए...कि महाराज से तेनाली राम को मुँह नहीं लगाना चाहिए...कि अब आया
है ऊँट पहाड़ के नीचे! अर्थात् जितने मुँह, उतनी बातें!
सभासदों के जाने के बाद महाराज ने तेनाली राम से पूछा, “तेनाली राम, तुम कितने
दिनों में सिद्ध कर सकोगे कि धनवानों की अपेक्षा गरीब आदमी अधिक ईमानदार होता
है?”
“महाराज! मुझे सौ-सौ स्वर्णमुद्राओं की दो थैलियाँ और दो सुरक्षा प्रहरी प्रदान करें। मैं
यह बात दो दिनों अर्थात आज और कल में प्रमाणित कर दूँगा कि धनवान लोगों में धन-
लोलुपता होती है जो उन्हें ईमानदार नहीं रहने देती जबकि गरीबों में धन-लोलुपता नहीं
होती!” तेनाली राम ने कहा।
महाराज तेनाली राम के इस उत्तर से भीतर ही भीतर तिलमिला गए। मगर उन्होंने कुछ