तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवैभव की वास्तविकता
सप्तद्वीप नवखंड राज्य के राजा विचित्र भानु की युद्ध-पिपासा शान्त हो चुकी थी।
विजयनगर के साथ युद्ध में उसे पराजय का मुँह देखना पड़ा था। उसकी क्षमा-याचना को
विजयनगर के राजा महाराज कृष्णदेव राय ने जिस सहृदयता से लिया था उसे देखकर
विचित्र भानु विस्मित रह गया था। महाराज कृष्णदेव राय की उदारता से उसे यह बोध
हुआ था कि किसी भी शासक के लिए अभिमान और अहंकार उचित नहीं है। पराक्रमी होने
का यह कदापि अर्थ नहीं है कि बल-प्रयोग से अकारण किसी की अस्मिता पर चोट पहुँचाई
जाए। इस पराजय के बाद वह स्थिरचित्त से अपनी प्रजा की भलाई के कार्यों में लग गया।
सैन्य सामग्रियों पर होनेवाला व्यय अब कुएँ खुदवाने, तालाब बनवाने आदि कार्यों पर
होने लगा। वह अपने राज्य के ग्रामों को राजधानी से जोड़ने के उपक्रम में सड़कें बनवाने
लगा। विजयनगर में उसने देखा था कि वहाँ की प्रजा अपने राजा, महाराज कृष्णदेव राय
से किस तरह जुड़ी हुई है-महाराज कृष्णदेव राय उत्सव के समय अपने प्रजाजनों से
आत्मीयता से बातें करते थे और प्रजा के वरिष्ठ जनों को तो वे नाम लेकर बुलाते थे...यह
स्थिति दर्शाती थी कि महाराज कृष्णदेव राय सीधे अपनी प्रजा के सम्पर्क में हैं। इस निष्कर्ष
पर पहुँचने के बाद महाराज विचित्र भानु ने अपना सुरक्षा घेरा शिथिल किया। अब वह
प्रजा के लिए भी उपलब्ध था। सप्ताह के सात दिनों में एक दिन ऐसा भी था जिस दिन कोई
भी आदमी उससे सीधा सम्पर्क साध सकता था। अपना सरोकार बता सकता था। अनुनय-
विनय कर सकता था।
इस तरह विचित्रा भानु अपनी प्रजा के बीच लोकप्रिय होने लगा और एक दिन ऐसा भी
आया जब उसे लगा कि राज्य की रक्षा के नाम पर व्यर्थ ही बहुत व्यय करना पड़ता है।
सीमा की सुरक्षा पर लगे सैनिकों की संख्या कम होनी चाहिए। इस निष्कर्ष पर पहुँचते ही
महाराज विचित्र भानु ने सैनिकों को सीमा से बुलाकर उन्हें विविध उद्योग-धन्धों में
लगाना आरम्भ कर दिया। महाराज विचित्र भानु में आए इस परिवर्तन से प्रजा खुश थी।
कुछ ही समय में मिश्रित संस्कृतियोंवाला यह राज्य फिर से खुशहाल हो गया।
दूसरी ओर सप्तद्वीप खंड के साथ हुए युद्ध का प्रतिकूल प्रभाव विजयनगर के राजा
महाराज कृष्णदेव राय पर हुआ। वे इस बात से उद्वेलित थे कि विजयनगर को युद्ध का
सहारा लेना पड़ा। अतीत में उनके पूर्वजों द्वारा जो नहीं किया गया, वह उन्होंने किया।
उफ! यह अनर्थ भी तो राज्य-लिप्सा के कारण ही करना पड़ा! महाराज कृष्णदेव राय का
मन अवसन्न हो गया। एक विचित्रा सी विरक्ति के वशीभूत होकर वे कुछ अनमने से रहने
लगे। कभी दरबार में जाते, कभी नहीं जाते, कभी बोलते, कभी मौन हो जाते।
तेनाली राम महाराज कृष्णदेव राय में आए परिवर्तन का भान मिलते ही महाराज की