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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 100

आ. ३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १९
बाहर के तत्त्वरूप धारण करती है। यही विसर्ग तीन प्रकार हैं¹
आणव जो चित्तविश्रामरूप है, शाक्त जो चित्तसंबोध रूप और शाम्भव
वह जो चित्त-प्रलयरूप है। अतः विसर्ग ही भगवान् की सृष्टि विषयक
शक्ति है। इस प्रकार जब अनन्त विस्तृत स्वरूप को किसी प्रकार
विभाग रहित रूप में परामर्श किया जाता है, भगवान एक ही है,
( लेकिन ) बीज और योनि इन दो विभक्त रूप में परामर्श होने पर वह
शक्तिमान और शक्ति हैं। चक्रेश्वर के साथ आठों के समूह के अलग अलग
परामर्श होने पर नौ वर्ग हैं। एक एक वर्ण के परामर्श जब प्रधान है
तब वह पचास है।२ इनमें भी सम्भाव्य भेद के परामर्श होने पर इक्यासी
१. विसर्ग तीन प्रकार हैं (१) आणव, (२) शाक्त, (३) शाम्भव, जो भेद,
भेदाभेद और अभेदात्मक हैं। आणव विसर्ग से प्रमाता और प्रमेयरूपी
विश्व जो चित्त के सम्मुख इदं रूप में भासित होता है उसे समझना
चाहिए। इस परिदृश्यमान संसार में एक ओर चित् है और दूसरी ओर है
चेत्य । चेतनभाव जब सीमित हो जाता तब चित् ही चित्त बन जाता है,
उस समय भेदमय संसार ही दृष्टिगोचर होता है। आणव विसर्ग ही मायिक
सृष्टि है।
शाक्त विसर्ग इससे भिन्न है जो भेदाभेद प्रधान है। इसमें संकुचित
प्रमातृभाव शान्त हो जाता है, उस समय अनुभव होने लगता है चित्त
भी स्वात्म-संवित् में ही भासमान है। इसमें भेद का आभास रहते हुए
भी अभेदभाव प्रधान है।
शाम्भव विसर्ग में चित्त सर्वथा विलीन हो जाता है जिसके फल-
स्वरूप संकुचित ज्ञान पूर्णज्ञान के रूप में प्रकट होता है। उस समय जो भी
कुछ भासता है वह स्वात्मसंविद् रूप में ही भासता है। यह आनन्दरूप
विसर्ग है लेकिन पहले दो में एक ज्ञान और दूसरा क्रियारूप हैं।
२. वर्णों की संख्या पचास है अ से ह तक विभिन्न वर्ण शैव छत्तीस तत्त्वों के
वाचक हैं। अ से अः शिवशक्ति तत्त्वों के, क से ङ तक पृथ्वी से आकाश,
च से ञ तक गन्ध से शब्दतन्मात्र पंचक, ट से ण तक पाद से वाक्
कर्मेन्द्रिय पंचक, त से न तक घ्राण से श्रोत्र ज्ञानेन्द्रिय पंचक, प से म तक
मन, बुद्धि, अहंकार प्रकृति और पुरुष, य से व तक राग, विद्या, कला,
माया आदि तत्त्व, श, ष, स, शुद्ध विद्या ईश्वर और सदाशिव के वाचक
हैं। चक्रेश्वर क्ष कार है।