तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें९२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[मूल संस्कृत]
कर्मनिमित्तत्वाद्विद्याया यत्ना-
न्तरानर्थक्यमिति चेत्कर्मभ्य एव
पूर्वोपचितदुरितप्रतिबन्धक्षयादेव
विद्योत्पद्यते चेत्कर्मभ्यः पृथगुप-
निषच्छ्रवणादियत्नोऽनर्थक इति
चेत् ।
न; नियमाभावात् । न हि
प्रतिबन्धक्षयादेव विद्योत्पद्यते न
त्वीश्वरप्रसादतपोध्यानाद्यनुष्ठा-
नादिति नियमोऽस्ति । अहिंसा-
ब्रह्मचर्यादीनां च विद्यां प्रत्युप-
कारकत्वात्साक्षादेव च कारणत्वा-
च्छ्रवणमनननिदिध्यासनानाम् ।
अतः सिद्धान्याश्रमन्तराणि
सर्वेषां चाधिकारो विद्यायां परं
च श्रेयः केवलाया विद्याया
एवेति सिद्धम् ।
[हिन्दी अनुवाद]
पूर्व ०–ज्ञान कर्मके निमित्तसे होने-
वाला है, इसलिये भी अन्य प्रयत्नकी
निरर्थकता सिद्ध होती है। यदि कर्मों-
के द्वारा ही पूर्वसञ्चित पापरूप प्रति-
बन्धका क्षय होनेपर ज्ञानकी उत्पत्ति
होती है तो कर्मोंसे भिन्न उपनिषच्छ्रव-
णादिविषयक प्रयत्न व्यर्थ ही है।
ऐसा मानें तो ?
सिद्धान्ती – नहीं, क्योंकि ऐसा
कोई नियम नहीं है—'ज्ञानकी उत्पत्ति
प्रतिबन्धके क्षयसे ही होती है,
ईश्वरकृपा, तप एवं ध्यानादिके
अनुष्ठानसे नहीं हो सकती' ऐसा
कोई नियम नहीं है; क्योंकि अहिंसा
एवं ब्रह्मचर्यादि भी ज्ञानोत्पत्तिमें
उपयोगी हैं तथा श्रवण, मनन और
निदिध्यासनादि तो उसके साक्षात्
कारण ही हैं। अतः अन्य आश्रमों-
का होना सिद्ध ही है तथा ज्ञानमें
सभी आश्रमियोंका अधिकार है।
इससे यह सिद्ध हुआ कि परमश्रेयकी
प्राप्ति केवल ज्ञानसे ही हो सकती है।
इति शीक्षावल्ल्यामेकादशोऽनुवाकः ॥ ११ ॥
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri