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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 7

निवेदन
कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयारण्यकके प्रपाठक ७-८ और ९ का नाम
तैत्तिरीयोपनिषद् है । इनमें सप्तम प्रपाठक, जिसे तैत्तिरीयोपनिषद्‌की
शीक्षावल्ली कहते हैं, सांहिती उपनिषद् कही जाती है और अष्टम तथा
नवम प्रपाठक, जो इस उपनिषद्‌की ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली हैं,
वारुणी उपनिषद् कहलाती हैं । इनके आगे जो दशम प्रपाठक है उसे
नारायणोपनिषद् कहते हैं, वह याज्ञिकी उपनिषद् है । इनमें महत्त्वकी
दृष्टिसे वारुणी उपनिषद् प्रधान है; उसमें विशुद्ध ब्रह्मविद्याका ही निरूपण
किया गया है । किन्तु उसकी उपलब्धिके लिये चित्तकी एकाग्रता एवं
गुरुकृपाकी आवश्यकता है । इसके लिये शीक्षावल्लीमें कई प्रकारकी
उपासना तथा शिष्य एवं आचार्यसम्बन्धी शिष्टाचारका निरूपण किया
गया है । अतः औपनिषद सिद्धान्तको हृदयंगम करनेके लिये पहले
शीक्षावल्ल्युक्त उपासनादिका ही आश्रय लेना चाहिये । इसके आगे
ब्रह्मानन्दवल्ली तथा भृगुवल्लीमें जिस ब्रह्मविद्याका निरूपण है उसके
सम्प्रदायप्रवर्त्तक वरुण हैं; इसलिये वे दोनों वल्लियाँ वारुणी विद्या अथवा
वारुणी उपनिषद् कहलाती हैं ।
इस उपनिषद्पर भगवान् शङ्कराचार्यने जो भाष्य लिखा है वह
बहुत ही विचारपूर्ण और युक्तियुक्त है । उसके आरम्भमें ग्रन्थका

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri