तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ
पृष्ठ 221, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 221ब्रह्म विजिज्ञासुरुपससारोपगत- | जाननेकी इच्छावाला होकर अपने
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५
ब्रह्म विजिज्ञासुरुपससारोपगत- | जाननेकी इच्छावाला होकर अपने
वान्, अधीहि भगवो ब्रह्मेत्य- | पिता वरुणके पास गया। अर्थात्
नेन मन्त्रेण । अधीहि अध्यापय | 'हे भगवन् ! आप मुझे ब्रह्मका
कथय । स च पिता विधिवदुप- | उपदेश कीजिये' इस मन्त्रके द्वारा
सन्नाय तस्मै पुत्रायैतद्वचनं | [ उसने गुरूपसदन किया ] ।
प्रोवाच । अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं | 'अधीहि' शब्दका अर्थ अध्यापन
मनो वाचमिति । | ( उपदेश ) कीजिये—कहिये ऐसा
अन्नं शरीरं तदभ्यन्तरं च | समझना चाहिये । उस पिताने
[वरुणोपदिष्ट-ब्रह्मप्राप्तिद्वाराणि] प्राणमत्तारमुपल- | अपने पास विधिपूर्वक आये हुए
ब्धिसाधनानि चक्षुः | उस पुत्रसे यह वाक्य कहा—'अन्नं
श्रोत्रं मनो वाचमित्येतानि ब्रह्मो- | प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनः वाचम् ।'
पलब्धौ द्वाराण्युक्तवान् । उक्त्वा | 'अन्न अर्थात् शरीर उसके भीतर
च द्वारभूतान्येतान्यन्नादीनि तं | अन्न भक्षण करनेवाला प्राण,
भृगुं होवाच ब्रह्मणो लक्षणम् । | तदनन्तर विषयोंकी उपलब्धिके
किं तत् ? | साधनभूत चक्षु, श्रोत्र, मन और
यतो यस्माद्वा इमानि ब्रह्मा- | वाक् ये ब्रह्मकी उपलब्धिमें द्वाररूप
[ब्रह्मलक्षणम्] दीनि स्तम्बपर्यन्तानि | हैं'—ऐसा उसने कहा । इस
भूतानि जायन्ते । | प्रकार इन द्वारभूत अन्नादिको
येन जातानि जीवन्ति प्राणा- | बतलाकर उसने उस भृगुको ब्रह्मका
न्धारयन्ति वर्धन्ते । विनाशकाले | लक्षण बतलाया। वह क्या है ?
| [ सो बतलाते हैं— ]
| जिससे ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त
| ये सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं,
| जिसके आश्रयसे ये जन्म लेनेके
| अनन्तर जीवित रहते—प्राण धारण
| करते अर्थात् वृद्धिको प्राप्त होते हैं
| तथा विनाशकाल उपस्थित होनेपर
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