तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
विज्ञानम् । न तथैह ब्रह्मविज्ञानं | का ही उपदेश किया जाता है ।
| उसके समान इस प्रसङ्गमें ब्रह्म-
व्यतिरेकेण साधनान्तरविषयं | विज्ञानसे भिन्न किसी अन्य साधन-
| सम्बन्धी विज्ञानका उपदेश नहीं
विज्ञानमुपदिश्यते । | किया जाता ।
उक्तकर्मादिसाधनापेक्षं ब्रह्म- | यदि कहो कि [ पूर्वकाण्डमें ]
| कहे हुए कर्मकी अपेक्षावाला ब्रह्मज्ञान
विज्ञानं परप्राप्तौ साधनमुप- | परमात्माकी प्राप्तिमें साधनरूपसे
| उपदेश किया जाता है, तो ऐसी
दिश्यत इति चेन्न; नित्य- | बात भी नहीं है; क्योंकि मोक्ष
| नित्य है—इत्यादि हेतुओंसे इसका
त्वान्मोक्षस्येत्यादिना प्रत्युक्त- | पहले ही निराकरण किया जा चुका
| है । 'उसे रचकर वह उसीमें अनु-
त्वात् । श्रुतिश्च तत्सृष्ट्वा तदेवा- | प्रविष्ट हो गया' यह श्रुति भी कार्य-
| में स्थित आत्माका परमात्मत्व प्रदर्शित
नुप्राविशदिति कार्यस्थस्य तदा- | करती है । अभय-प्रतिष्ठाकी उपपत्ति-
त्मत्वं दर्शयति । अभयप्रतिष्ठोप- | के कारण भी [ उनका अभेद ही
| मानना चाहिये ] । यदि ज्ञानी अपनेसे
पत्तेश्च । यदि हि विद्यावान्स्वा- | भिन्न किसी औरको नहीं देखता
| तो वह अभयस्थितिको प्राप्त कर
त्मनोऽन्यन्न पश्यति ततोऽभयं | लेता है—ऐसा कहा जा सकता
| है; क्योंकि उस अवस्थामें भयके
प्रतिष्ठां विन्दत इति स्याद्भयहेतोः | हेतुभूत अन्य पदार्थकी सत्ता नहीं
| रहती । अन्य पदार्थ [ अर्थात्
परस्यान्यस्याभावात् । अन्यस्य | द्वैत ] के अविद्याकृत होनेपर
चाविद्याकृतत्वे विद्ययावस्तुत्व- | ही विद्याके द्वारा उसके अवस्तुत्व-
| दर्शनकी उपपत्ति हो सकती
दर्शनोपपत्तिस्तद्धि द्वितीयस्य | है । [ भ्रान्तिवश प्रतीत होनेवाले ]
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri