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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 261 में से

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पृष्ठ 197

अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९१
गताः स एष परमानन्दः स्वा- | प्राप्त हुई हैं वही अद्वैतरूप होने-
भाविकोऽद्वैतत्वादानन्दानन्दि- | से स्वाभाविक परमानन्द है । इसमें
आनन्द और आनन्दीका अभेद
नोश्चाविभागोऽत्र ॥ १-४ ॥ | है ॥ १-४ ॥
ब्रह्मात्मैक्य-दृष्टिका उपसंहार
तदेतन्मीमांसाफलमुपसंह्रियते— | अब इस मीमांसाके फलका
उपसंहार किया जाता है—
स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः । स य
एवंविद्वस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति ।
एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं मनोमयमात्मान-
मुपसंक्रामति । एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रामति । एत-
मानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । तदप्येष श्लोको
भवति ॥ ५ ॥
वह, जो कि इस पुरुष (पञ्चकोशात्मक देह) में है और जो
यह आदित्यके अन्तर्गत है, एक है । वह, जो इस प्रकार जाननेवाला है,
इस लोक (दृष्ट और अदृष्ट विषयसमूह) से निवृत्त होकर इस अन्नमय
आत्माको प्राप्त होता है [अर्थात् विषयसमूहको अन्नमय कोशसे पृथक्
नहीं देखता] । इसी प्रकार वह इस प्राणमय आत्माको प्राप्त होता है,
इस मनोमय आत्माको प्राप्त होता है, इस विज्ञानमय आत्माको प्राप्त
होता है एवं इस आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है । उसीके विषयमें
यह श्लोक है ॥ ५ ॥
यो गुहायां निहितः परमे | जो आकाशसे लेकर अन्नमय
कोशपर्यन्त कार्यकी रचना करके
ब्रह्मात्मैक्योप- व्योम्न्याकाशादि- | उसमें अनुप्रविष्ट हुआ परमाकाशके
संहारः कार्यं सृष्ट्वान्न⁠मया- | भीतर बुद्धिरूप गुहामें स्थित है
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri