तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
विदुषोऽप्यगमनमाशङ्क्यते किं | अविद्वान्के समान विद्वान्की भी
विद्वान्समश्नुते न समश्नुत इति | ब्रह्मप्राप्तिके विषयमें 'विद्वान् उसे प्राप्त
| होता है या नहीं?' ऐसी शंका की
तृतीयोऽनुप्रश्नः । | जाती है। यह तीसरा अनुप्रश्न है।
एतेषां प्रतिवचनार्थमुत्तरग्रन्थ | आगेका ग्रन्थ इन प्रश्नोंका उत्तर
[ब्रह्मणः सत्त्व-] आरभ्यते । तत्रा- | देनेके लिये ही आरम्भ किया जाता
[रूपत्वस्थापनम्] स्तित्वमेव तावदु- | है । उसमें सबसे पहले ब्रह्मके
| अस्तित्वका ही वर्णन किया जाता
च्यते । यच्चोक्तम् 'सत्यं ज्ञान- | है । 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है',
मनन्तं ब्रह्म' इति, तच्च कथं | ऐसा जो पहले कह चुके हैं सो
सत्यत्वमित्येतद्वक्तव्यमितीदमु- | वह ब्रह्मकी सत्यता किस प्रकार
| है—यह बतलाना चाहिये । इस-
च्यते सत्त्वोक्त्यैव सत्यत्वमुच्यते । | पर कहते हैं—उसकी सत्ता
उक्तं हि "सदेव सत्यम्" इति । | बतलानेसे ही उसके सत्यत्वका भी
| प्रतिपादन हो जाता है । "सत् ही
तस्मात्सत्त्वोक्त्यैव सत्यत्वमुच्य- | सत्य है" ऐसा अन्यत्र कहा भी
ते । कथमेवमर्थतावगम्यतेऽस्य | है । अतः उसकी सत्ता बतलानेसे
ग्रन्थस्य शब्दानुगमात् । अने- | ही उसका सत्यत्व भी बतला
| दिया जाता है । किन्तु इस ग्रन्थ-
नैव ह्यर्थेनान्वितान्युत्तराणि | का भी यही तात्पर्य है—यह कैसे
वाक्यानि "तत्सत्यमित्याच- | जाना गया ? इसपर कहते हैं—
क्षते" ( तै० उ० २ । ६ । १ ) | शब्दोंके अनुगमन ( अभिप्राय ) से;
"यदेष आकाश आनन्दो न | क्योंकि "वह सत्य है—ऐसा कहते
| हैं", "यदि यह आनन्दमय आकाश
स्यात्" ( तै० उ० २ । ७ । १ ) | न होता" आदि आगेके वाक्य भी
इत्यादीनि । | इसी अर्थसे युक्त हैं ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri