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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 261 में से

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पृष्ठ 160

१५४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

सामान्यं हि ब्रह्माकाशादि- | आकाशादिका कारण होनेसे
[हाशिया: विद्वदविद्वद्भेदेन] कारणत्वाद्विदुषो- | ब्रह्म विद्वान् और अविद्वान् दोनों-
[हाशिया: ब्रह्मप्राप्तावाक्षेपः] ऽविदुषश्च। तस्माद्- | हीके लिये समान है । इससे
विदुषोऽपि ब्रह्मप्राप्तिराशङ्क्यते- | अविद्वान्को भी ब्रह्मकी प्राप्ति होती
उत अपि अविद्वानमुं लोकं | है—ऐसी आशंका की जाती है—
परमात्मानमितः प्रेत्य कश्चन, | क्या कोई अविद्वान् पुरुष भी इस
चनशब्दोऽप्यर्थे, अविद्वानपि | शरीरको छोड़नेके अनन्तर इस लोक
गच्छति प्राप्नोति किं वा न गच्छ- | अर्थात् परमात्माको प्राप्त हो जाता
तीति द्वितीयोऽपि प्रश्नो द्रष्ट- | है ?—'कश्चन' में 'चन' शब्द 'अपि
व्योऽनुप्रश्ना इति बहुवचनात् । | (भी)' के अर्थमें है । 'अथवा
| नहीं होता ?' यह इसके साथ
| दूसरा प्रश्न भी समझना चाहिये;
| क्योंकि यहाँ 'अनुप्रश्नाः' ऐसा बहु-
| वचनका प्रयोग किया गया है ।
विद्वांसं प्रत्यन्यौ प्रश्नौ । यद्य- |
विद्वान्सामान्यं कारणमपि ब्रह्म | अन्य दो प्रश्न विद्वान्के विषयमें
न गच्छति ततो विदुषोऽपि | हैं—ब्रह्म सबका साधारण कारण है,
ब्रह्मागमनमाशङ्क्यते । अतस्तं | तब भी यदि अविद्वान् उसे प्राप्त
प्रति प्रश्न आहो विद्वानिति । | नहीं होता तो विद्वान्के भी ब्रह्मको
उकारं च वक्ष्यमाणमधस्तादप- | प्राप्त न होनेकी आशंका होती है;
कृष्य तकारं च पूर्व- | अतः उसके उद्देश्यसे पूछा जाता
स्मादुतशब्दाद्व्यासज्याहो इत्ये- | है—'क्या विद्वान् भी' आदि ।
तस्मात्पूर्वमुतशब्दं संयोज्य | [मूल मन्त्रमें] आगे कहे जानेवाले
पृच्छति—उताहो विद्वानिति । | 'उ' को आगेसे खींचकर और
| पूर्वोक्त 'उत' शब्दसे उसमें 'त'
| जोड़कर 'आहो' इस शब्दके पहले
| 'उत' शब्द जोड़कर 'उताहो विद्वान्'
| इत्यादि प्रकारसे पूछता है—क्या
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri