तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[ वाम भाग / संस्कृत ]
मन्त्रोदाहरणमुपपद्यते । ब्रह्म पुच्छं
प्रतिष्ठेत्यपि चानुपपन्नं पृथग्ब्र-
ह्मणः प्रतिष्ठात्वेन ग्रहणम् ।
तस्मात्कार्यपतित एवानन्दमयो
न पर एवात्मा ।
आनन्द इति विद्याकर्मणोः
[आनन्दमयकोश-प्रतिपादनम्] फलं तद्विकार आ-
नन्दमयः । स च
विज्ञानमयादान्तरः । यज्ञा-
दिहेतोर्विज्ञानमयादस्यान्तरत्व-
श्रुतेः । ज्ञानकर्मणोर्हि फलं
भोक्त्रर्थत्वादान्तरतमं स्यात् ।
आन्तरतमश्चानन्दमय आत्मा
पूर्वेभ्यः । विद्याकर्मणोः प्रिया-
द्यर्थत्वाच्च । प्रियादिप्रयुक्ते हि
विद्याकर्मणी । तस्मात्प्रियादीनां
फलरूपाणामात्मसंनिकर्षाद्वि-
ज्ञानमयस्याभ्यन्तरत्वमुपपद्यते ।
प्रियादिवासनानिर्वृत्तो ह्यानन्द-
[ दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद ]
ही है" इस मन्त्रका उल्लेख संगत
हो सके । तथा 'ब्रह्म पुच्छ-प्रतिष्ठा
है' इस वाक्यके अनुसार प्रतिष्ठा-
रूपसे ब्रह्मको पृथक् ग्रहण करना
भी नहीं बन सकता । अतः यह
आनन्दमय कार्यवर्गके अन्तर्गत ही
है—परमात्मा नहीं है ।
'आनन्द' यह उपासना और
कर्मका फल है, उसका विकार
आनन्दमय कहलाता है । वह
विज्ञानमय कोशसे आन्तर है; क्योंकि
श्रुतिके द्वारा वह यज्ञादिके कारणभूत
विज्ञानमयकी अपेक्षा आन्तर बतलाया
गया है । उपासना और कर्मका फल
भोक्ताके ही लिये है, इसलिये वह
सबसे आन्तरतम होना चाहिये; सो
पूर्वोक्त सब कोशोंकी अपेक्षा
आनन्दमय आत्मा आन्तरतम है ही;
क्योंकि विद्या और कर्म भी
[ प्रधानतया ] प्रिय आदिके ही लिये
हैं । प्रिय आदिकी प्राप्तिके उद्देश्यसे
ही उपासना और कर्मका अनुष्ठान
किया जाता है; अतः उनके फलरूप
प्रिय आदिका आत्मासे सान्निध्य
होनेके कारण विज्ञानमयकी अपेक्षा
इस ( आनन्दमय कोश ) का
आन्तरतम होना उचित ही है ।
प्रिय आदिकी वासनासे निष्पन्न
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri