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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 261 में से

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पृष्ठ 139

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३
मात्मायुर्जीवनहेतुत्वादिति ते । और उनके जीवनका कारण होनेसे
सर्वमेवायुरस्मिँल्लोके यन्ति; नाप- । उनकी आयु हूँ' इस प्रकार ब्रह्मरूपसे
मृत्युना म्रियन्ते प्राक्प्राप्तादायुष । उपासना करते हैं वे इस लोकमें
इत्यर्थः । शतं वर्षाणीति तु युक्तं । पूर्ण आयुको प्राप्त होते हैं । अर्थात्
“सर्वमायुरेति” ( छा० उ० २ । । प्रारब्धवश प्राप्त हुई आयुसे पूर्व
११–२०, ४ । ११–१३ ) इति । अपमृत्युसे नहीं मरते । “पूर्ण आयु-
श्रुतिप्रसिद्धेः । । को प्राप्त होता है” ऐसी श्रुति-प्रसिद्धि
किं कारणं प्राणो हि भूता- । होनेके कारण यहाँ [ 'सर्वायु'
नामायुस्तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति । । शब्दसे ] सौ वर्ष समझने चाहिये ।
। [ प्राणको सर्वायु समझनेका ]
यो यद्गुणं ब्रह्मोपास्ते स तद्- । क्या कारण है ? क्योंकि प्राण ही
। प्राणियोंकी आयु है इसलिये वह
गुणभागभवतीति विद्याफलप्राप्ते- । 'सर्वायुष' कहा जाता है । जो
। व्यक्ति जैसे गुणवाले ब्रह्मकी उपासना
हेत्वर्थं पुनर्वचनं प्राणो हीत्यादि । । करता है वह उसी प्रकारके गुणका
। भागी होता है—इस प्रकार विद्याके
तस्य पूर्वस्यान्नमयस्यैष एव । फलकी प्राप्तिके इस हेतुको प्रदर्शित
। करनेके लिये 'प्राणो हि भूताना-
शारीरेऽन्नमये भवः शारीर । मायुः' इत्यादि वाक्यकी पुनरुक्ति की
। गयी है । यही उस पूर्वकथित
आत्मा । कः ? य एष प्राणमयः । । अन्नमय कोशका शारीर—अन्नमय
। शरीरमें रहनेवाला आत्मा है । कौन ?
। जो कि यह प्राणमय है ।
तस्माद्वा एतस्मादित्युक्तार्थ- । 'तस्माद्वा एतस्मात्' इत्यादि शेष
[मनोमयकोश-] मन्यत् । अन्यो- । पदोंका अर्थ पहले कह चुके हैं ।
[निर्वचनम्] ऽन्तर आत्मा मनो- । दूसरा अन्तर-आत्मा मनोमय है ।
। संकल्प-विकल्पात्मक अन्तःकरणका
मयः । मन इति संकल्पाद्यात्म- । नाम मन है; जो तद्रूप हो उसे
कमन्तःकरणं तन्मयो मनोमयो । मनोमय कहते हैं; जैसे