तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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भावाद्धिज्ञानानुपपत्तिः । आत्म- | सम्भव ही नहीं है । आत्माका
| विज्ञेयत्व स्वीकार करनेपर तो ज्ञाताके
नश्च विज्ञेयत्वे ज्ञातृभावप्रसङ्गः; | अभावका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता
| है; क्योंकि वह तो विज्ञेयरूपसे ही
ज्ञेयत्वेनैव विनियुक्तत्वात् । | विनियुक्त ( प्रयुक्त ) हो चुका है ।
| [ अब उसे ज्ञाता कैसे माना जाय ? ]
एक एवात्मा ज्ञेयत्वेन ज्ञातृ- | शङ्का—एक ही आत्मा ज्ञेय और
| ज्ञाता दोनों प्रकारसे हो सकता है—
त्वेन चोभयथा भवतीति चेत् ? | ऐसा मानें तो ?
न युगपदनंशत्वात् । न हि | समाधान—नहीं, वह अंशरहित
| होनेके कारण एक साथ उभयरूप
निरवयवस्य युगपज्ज्ञेयज्ञातृत्वो- | नहीं हो सकता । निरवयव ब्रह्मका
| एक साथ ज्ञेय और ज्ञाता होना
पपत्तिः । आत्मनश्च घटादिवद्विज्ञे- | सम्भव नहीं है । इसके सिवा यदि
| आत्मा घटादिके समान विज्ञेय हो
यत्वे ज्ञानोपदेशानर्थक्यम् । न | तो ज्ञानके उपदेशकी व्यर्थता हो
| जायगी । जो वस्तु घटादिके समान
हि घटादिवत्प्रसिद्धस्य ज्ञानोप- | प्रसिद्ध है उसके ज्ञानका उपदेश
| सार्थक नहीं हो सकता । अतः
देशोऽर्थवान् । तस्माज्ज्ञातृत्वे | उसका ज्ञातृत्व माननेपर उसकी
| अनन्तता नहीं रह सकती । ज्ञान-
सति आनन्त्यानुपपत्तिः । | कर्तृत्वादि विशेषसे युक्त होनेपर
| उसका सन्मात्रत्व भी सम्भव नहीं
सन्मात्रत्वं चानुपपन्नं ज्ञान- | है । और “वह सत्य है” इस एक
| अन्य श्रुतिसे उसका सत्यरूप होना
कर्तृत्वादिविशेषवत्त्वे सति । स- | ही सन्मात्रत्व है । अतः 'सत्य' और
| 'अनन्त' शब्दोंके साथ विशेषण-
न्मात्रत्वं च सत्यत्वम्, "तत्स-
त्यम्” ( छा० उ० ६ । ८ । १६ )
इति श्रुत्यन्तरात् । तस्मा-
त्सत्यानन्तशब्दाभ्यां सह विशे-
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri