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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 261 में से

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पृष्ठ 101

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५

सह नाववतु-नौ शिष्याचार्यौ | 'सह नाववतु'-[ वह ब्रह्म ] हम
सहैवावतु रक्षतु । सह नौ भुनक्तु | आचार्य और शिष्य दोनोंकी साथ-
भोजयतु । सह वीर्यं विद्यादि- | साथ ही रक्षा करें और हमारा साथ-
निमित्तं सामर्थ्यं करवावहै निर्वर्त- | साथ भरण अर्थात् पालन करे । हम
यावहै । तेजस्वि नावावयोरुत्तेज- | साथ-साथ वीर्य यानी विद्याजनित
स्विनोरधीतं स्वधीतमस्तु, अर्थ- | सामर्थ्य सम्पादन करें; हम दोनों
ज्ञानयोग्यमस्त्वित्यर्थः । मा | तेजस्वियोंका अध्ययन किया हुआ
विद्विषावहै; विद्याग्रहणनिमित्तं | तेजस्वी-सम्यक् प्रकारसे अध्ययन
शिष्यस्याचार्यस्य वा प्रमादकृता- | किया हुआ अर्थात् अर्थ-ज्ञानके योग्य
दन्यायाद्द्विद्वेषः प्राप्तस्तच्छमनाय | हो तथा हम विद्वेष न करें । विद्या-
इयमाशीर्मा विद्विषावहा इति । | ग्रहणके कारण शिष्य अथवा
मैवेतरेतरं विद्वेषमापद्यावहै । | आचार्यका प्रमादकृत अन्यायसे
| द्वेष हो सकता है; उसकी शान्तिके
| लिये 'मा विद्विषावहै' ऐसी कामना
| की गयी है । तात्पर्य यह है कि
| हम एक-दूसरेके विद्वेषको प्राप्त न हों ।
शान्तिः शान्तिः शान्तिरिति | 'शान्तिः शान्तिः शान्तिः' इस
त्रिर्वचनमुक्तार्थम् । वक्ष्यमाण- | प्रकार तीन बार 'शान्ति' शब्द
विद्याविघ्नप्रशमनार्था चेयं | उच्चारण करनेका प्रयोजन पहले कहा
शान्तिः । अविघ्नेनात्मविद्या- | जा चुका है । यह शान्तिपाठ आगे
प्राप्तिराशास्यते तन्मूलं हि परं | कही जानेवाली विद्याके विघ्नोंकी
श्रेय इति । | शान्तिके लिये है । इसके द्वारा
| निर्विघ्नतापूर्वक आत्मविद्याकी प्राप्ति-
| की कामना की गयी है; क्योंकि वही
| परम श्रेयका भी मूल कारण है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri