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सर्वकोश
तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)

तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)

Taittiriya Aranyaka with Sayanacharya Commentary

कृष्ण यजुर्वेदीय महर्षि मण्डल (भाष्यकार: श्रीमत् सायणाचार्य) द्वारा

DevanagariSanskritpublished914 पृष्ठ

पृष्ठ 695, कुल 914 में से

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पृष्ठ 695

दः" or "शाखामेदः". Let's look at the letter: it has the loop of म: "शाखामे२दः".

Let's check line 10:
"तत्र प्रथमानुवाकस्याऽऽदौ काश्चिदृचो ब्रह्मतत्त्वं प्रतिपाद-"
"यन्ति ।"

Let's check line 16:
"यो महान्मेर्वादिरूस्ततोऽपि महत्तरः ।"
Wait, "महान्मेर्वादिरूस्ततोऽपि" or "महान्मेर्वादिरूपस्ततोऽपि" or "महान्मेर्वादिस्ततोऽपि"?
Look at line 16:
"यो महान्मेर्वादिस्ततोऽपि महत्तरः ।"
Wait, between दि and स्त, what is that?
"महान्मेर्वादिस्ततोऽपि" - wait, is there a letter between दि and स्त?
Look at दि: दि has a curve, then स्त. It is just "महान्मेर्वादिस्ततोऽपि"!

Let's check line 17:
"तथा च च्छन्दोगा आमनन्ति-- “ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरि-"
"क्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः” इति ।"

Line 18-19:
"“स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स