तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)

तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)
Taittiriya Aranyaka with Sayanacharya Commentary
कृष्ण यजुर्वेदीय महर्षि मण्डल (भाष्यकार: श्रीमत् सायणाचार्य) द्वारा
DevanagariSanskritpublished914 पृष्ठ
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गायत्री॑ऽसि त्रैष्टुभोऽसि॒ जागत॑मसीति॑ शफोपयमा-
नाद॑त्ते। छन्दो॑भिरे॒वैना॒नाद॑त्ते (१८)।
सहोर्जो॒ भागेनोप॑गेहीत्या॑ह। ऊर्जं॒ एवैनां॑ भागम॑कः
(१९)।
अ॒श्विनौ॑ वा एतद्य॒ज्ञस्य॒ शिर॑: प्रति॒दध॑तावब्रूताम्।
आवाभ्या॑मेव पू॒र्वाभ्यां॑ वषट्क्रियाता इति॑। इन्द्रा॑श्विना
मध्वः॑ सार॒घस्येत्या॑ह। अश्विभ्या॑मेव पूर्वाभ्यां॒ वष॑ट्-
करोति। अथो॑ अ॒श्विना॑वेव भा॒गधेये॑न॒ समर्धयति
(५),(२०)।
घ॒र्मं पा॑तं वसवो यज॑ता वडि॒त्या॑ह। वसू॑नेव॒ भाग॑धे-
येन॒ समर्धयति (२१)।
यद्वष॑ट्कुर्यात्। यातया॑माऽस्य वषट्कारः स्या॑त्। यन्न