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तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)

तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)

Taittiriya Aranyaka with Sayanacharya Commentary

कृष्ण यजुर्वेदीय महर्षि मण्डल (भाष्यकार: श्रीमत् सायणाचार्य) द्वारा

DevanagariSanskritpublished914 पृष्ठ

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पृष्ठ 24

िकं हेमन्तस्य लक्षणमुक्तमेवमत्र शिशिरस्य लक्षणमु-

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१ ग. ॰तुर्थीमा॰ । २ ग. ॰क्ष्मपा॰ । ३ ग. ॰पणेरि॰ । ४ ग. षष्ठीमा॰ ।

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३ (or २? look at the very bottom center: '३').

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[प्रपा०१।अनु०४] कृष्णयजुर्वेदीयं तैत्तिरीयारण्यकम् । १७
अभिधून्वन्तो॒ऽभिघ्न॑न्त इव । वात॑वन्तो म॒रुद्ग॑णाः, इति ।
यत्र यदा शरदाख्य ऋतुरुपदृश्यते तदानीमन्नमश्नीतेत्येता वाचः प्राणिभिः
प्रयुज्यन्ते, अनेन लक्षणेन शरदाख्यमृतुं जानीयादित्यर्थः । अथ हेमन्त ऋतुर्वर्ण्यते -
तस्मिन्नतौ मरुद्गणा देवविशेषसंघा अभिधून्वन्तः सर्वतः कम्पयन्तोऽभिघ्नन्त आभि-
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