स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
अर्थ—हे भगवन् ! चाहे अन्यवादी हज़ारों वर्ष तक तप तपें, अथवा युगांतरों तक योगोंकाँ
अभ्यास करें, फिर भी आपके मार्गका विना अवलम्ब लिये उन लोगोंको मोक्ष नहीं मिल सकता ।
परवादियोंके उपदेश भगवान्के मार्गमें बाधा नहीं पहुँचा सकते—
अनाप्तजाड्यादिविनिर्मितित्वसंभावनासंभविविप्रलम्भाः ।
परोपदेशाः परमाप्तक्लृप्तपथोपदशे किमु संरभन्ते ॥१५॥
अर्थ—हे देवाधिदेव ! अनाप्तोंकी मंद बुद्धि द्वारा रचे हुए विसंवादरूप दूसरोंके उपदेश परम आप्तके
द्वारा प्रतिपादित उपदेशोंमें क्या कुछ बाधा पहुँचा सकते हैं ? अर्थात् नहीं ।
भगवान्के शासनकी निष्प्रद्रवता—
यदार्जवादुक्तमयुक्तमन्यैस्तदन्यथाकारमकारि शिष्यैः ।
न विप्लवोऽयं तव शासनेऽभूदहो अधृष्या तैव शासनश्रीः² ॥१६॥
अर्थ—अन्य मतावलम्बियोंके गुरुओंने जो कुछ सरल भावसे अयुक्त कथन किया था, उसे उनके
शिष्योंने अन्यथा प्रतिपादन किया । हे भगवन् ! आश्चर्य है कि आपके शासनमें इस प्रकारका विप्लव
नहीं हो सका, अतएव आपका शासन अजेय है ।
परवादियोंके देवोंकी मान्यतामें परस्पर विरोध—
देहाद्ययोगेन सदाशिवत्वं शरीरयोगादुपदेशकर्म ।
परस्परस्पर्धि कथं घटेत परोपकॢप्तेष्वधिदैवतेषु ॥१७॥
अर्थ—हे वीतराग ! एक ही ईश्वर देहके अभावसे सदा आनन्दरूप है, और देहके सद्भावसे
उपदेशका देनेवाला है—इस प्रकार परवादियोंके देवताओंमें परस्पर विरोधी गुण कैसे रह सकते हैं ?
मोहका अभाव होनेसे भगवान् अवतार नहीं लेते—
प्रागेव देवांतरसंश्रितानि रागादिरूपाण्यवमांतराणि ।
न मोहजन्यां करुणामपीश समाधिमास्थाय युगाश्रितोऽसि (?) ॥१८॥
अर्थ—नीच वृत्तिवाले राग आदि दोषोंने पहले ही अन्य देवोंका आश्रय लिया है । इसलिये हे
ईश ! आप समाधिको प्राप्त करके मोहजन्य करुणाके वश होकर भी युग-युगमें अवतार धारण नहीं करते ।³
अपने ही संसारके क्षय करनेका यथार्थ उपदेश दिया है—
जगन्ति भिन्दन्तु सृजन्तु वा पुनर्यथा तथा वा पतयः प्रवादिनाम् ।
त्वदेकनिष्ठे भगवन् भवक्षयक्षमोपदेशे तु परं तपस्विनः ॥१९॥
१. सच्छासनं ते त्वमिवाप्रधृष्यम् । द्वा. द्वात्रिंशिका ५.२६ ।
२. स्वपक्ष एव प्रतिबद्धमत्सरा यथान्यशिष्या स्वरुचिप्रलापिनः ।
निरुक्तसूत्रस्य यथार्थवादिनो न तत्तथा यत्तव कोऽत्र विस्मयः ॥
द्वा. द्वात्रिंशिका १.१७; ५.२७ ।
३. यहाँ 'युगाश्रितोऽसि' का अर्थ ठीक नहीं बैठता । श्लोकका यह अर्थ श्रीमद्विजयानंद ( आत्मारामजी )
विरचित तत्वनिर्णयप्रासादके आधारसे लिखा गया है । मुनि चरणविजयजी द्वारा सम्पादित और
आत्मानन्द जैन सभाद्वारा प्रकाशित ( १९३४ ) अयोगव्यवच्छेदिकामें 'समाधिमास्थाय'के स्थानपर
'समाधिमाध्यस्थ्य' पाठ है ।