स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
भगवान्की यथार्थवादिता—
यथास्थितं वस्तु दिशन्नधीश न तादृशं कौशलमाश्रितोऽसि ।
तुरंगशृंगाण्यनुपपादयद्भूयो नमः परेभ्यो नवपण्डितेभ्यः ॥ ५ ॥
अर्थ—हे स्वामिन् ! आपने पदार्थोंका जैसेका तैसा वर्णन किया है, इसलिये आपने परवादियोंके
समान कोई कौशल नहीं दिखाया । अतएव घोड़ेके सींगके समान असंभव पदार्थोंको जन्म देनेवाले परवादियोंके
नवीन पंडितोंको हम नमस्कार करते हैं !
भगवानमें व्यर्थकी दयालुताका अभाव—
जगत्यनुध्यानबलेन शश्वत् कृतार्थयत्सु प्रसभं भवत्सु ।
किमाश्रितोऽन्यैः शरणं त्वदन्यः स्वमांसदानेन वृथा कृपालुः ॥¹ ६ ॥
अर्थ—हे पुरुषोत्तम ! अपने उपकारके द्वारा जगतको सदा कृतार्थ करनेवाले ऐसे आपको छोड़कर
अन्य वादियोंने अपने मांसका दान करके व्यर्थ ही कृपालु कहे जानेवालेकी क्यों शरण ली है ? यह समझमें
नहीं आता ! ( यह कटाक्ष बुद्धके ऊपर है ) ।²
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