स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
बढ़ने लगी वैसे-वैसे यह सब ठिकाने भी बढ़ने लगे। सन् 1857-58 की अंग्रेजों और भारतीयों के बीच की बड़ी लड़ाई के बाद, जिसमें अन्ततः भारतीय हार ही गये, उनके सैकड़ों शहर लूटे गये और उनके पचासों लाख लोगों को वृक्षों पर लटका कर, अलग-अलग तरीकों से, मार दिया गया। इसके बाद अंग्रेजों को यह आवश्यक लगा कि भारत में बड़े पैमाने पर अंग्रेजों और यूरोपियों को बसाने का काम तेजी से आरम्भ किया जाना चाहिये। आज जो यह पहाड़ी शहर देशभर में हैं और काफी चाय व काफी के बगीचे या दूसरे बड़े व्यापारिक खेती के मैदान असम, बिहार और दक्षिण भारत इत्यादि में बने हैं, ये अधिकांशतः सन् 1860 के इसी अंग्रेजी फैसले के बाद स्थापित हुए।
इसी तरह सैनिकों की छावनियाँ भी और बढ़ाई गयी होंगी। आज शायद यह मानना पड़ेगा कि अंग्रेजों ने भारत में जो यह विस्तृत तंत्र खड़ा किया है वह सारे देश से जल्दी जाने वाला नहीं है। यह तंत्र कैसे यहाँ से उखड़े, इसके लिए तो हमें काफी सोचना होगा। ऐसे रास्ते निकालने होंगे जिससे हम अपना तंत्र खड़ा कर सकें, जिससे कि भारत की राज्य व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, कृषि, वन, जल के साधन, बड़े और छोटे उद्योग और भारतीयों का सार्वजनिक जीवन, देश के लोगों के मन के अनुसार चल सके। इस तरह के सवाल स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में और पिछले 53 वर्षों में निश्चय ही हमारे विचारकों व राजनैतिकों के मन में उठे होंगे। सन् 1946 से सन् 1949 तक जो संवैधानिक सभा हमारे यहां बैठी, और जिसमें संविधान के बारे में काफी सोच-विचार और बातचीत हुई, उसमें भी इस तरह के प्रश्न उठे होंगे। उसके बाद भी देश की स्थिति को सामने रखकर ऐसे प्रश्न उठते ही दिखते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अखिल भारतीय कांग्रेस में भी इस तरह के प्रश्न जब तब, गांधीजी के बाद भी, उठते रहे। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने स्वयं शायद कहा था कि उनके पिता जवाहर लाल नेहरू ने बड़ी गलती की कि अंग्रेजों के बनाये तंत्र को जैसा का तैसा रहने दिया। साधारण लोग और काफी सारे समाजवादी नेता और भारतीय जनता दल के कुछ नेता भी ऐसा कहते रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व श्री नरसिंह राव ने, जो पांच वर्ष तक भारत के प्रधानमंत्री रहे, इस तरह के प्रश्नों को फिर से उठाया है, वह भी लंदन में। हम लोग इस पर सोचेंगे और बराबर आग्रह रखेंगे तो, दस-बीस वर्ष में भारत में, अंग्रेजों के बनाये तंत्र को पूर्ण रूप से बदलने का काम तो कर ही सकते हैं। जब ऐसा होगा तभी भारतीय शिक्षा, कृषि-उद्योग, पुलिस, सेवा आदि क्षेत्रों के स्वरूप को भी आज के समय के अनुरूप और प्राणवान भारतीय रूप में बनाना सम्भव होगा।
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कहाँ हैं पश्चिमीकरण की जड़ें ?
वैसे तो भारत पिछले 20-30 वर्षों से विश्वशक्तियों के बढ़ते दबाव में है। भारत के गांव के प्राथमिक स्कूल भी उनके आदेश व सहायता से चलने लगे हैं। बसों का किराया बढ़े यह भी उनके आदेश से होने लगा है। सड़कें कैसी हों, कितनी चौड़ी हों इसके आदेश भी बाहर से आने लगे हैं। यहाँ तक कि सेवाग्राम आश्रम जैसे स्थान भी चौड़ी-चौड़ी सड़कों से घिरने लगे हैं। जबकि ऐसे स्थानों और स्थलों की शांति व पवित्रता के लिये यह आवश्यक था कि उनके आसपास अधिक मोटर गाड़ियां व दूसरे वाहन न चलें। विदेशों में हमारा सामान ज्यादा से ज्यादा जाये इसमें फँस कर पिछले पचास बरसों में हम अपनी हस्तकला उद्योग का विनाश ही कर चुके हैं। और कुछ महीनों से खादी ग्रामोद्योग आयोग इसमें लगा है कि हम खादी से अमरीकी जीन्स कपड़ा डैनिम और उससे जीन्स बनवायें और उन्हें विदेशों में भेजें।
हमारी खेती में तो बड़े पैमाने पर बगैर सोचे समझे विदेशीकरण हो चुका है। हमारे गांवों के कृषि व ग्रामोद्योग के उजड़ने का एक बड़ा कारण यह हमारी बेसमझी की नकल है। ये ही बेसमझी हमें आधुनिकता को समझने से भी दूर रखती है --- चाहे वो तकनीकी के प्रश्न हों, व्यवस्था के या हमारी अपनी दिशा के। भारत की मानसिकता, उसकी प्राथमिकतायें, उसकी प्राकृतिक उपलब्धियां हमारे आज के देश चलाने वाले लोग समझ नहीं सके हैं। जैसे दो हजार बरस से यूरोप, व उसके बाद अरब लोग मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय व्यापार व लूटमार पर जीवन चलाते थे। उसे ही हमने बेसमझी में मान लिया है कि बाकी विश्व का भी वही तरीका है। लेकिन हमारे यहाँ तो हमारी आवश्यकताओं की सभी वस्तुएं साधारणतः प्रचुर मात्रा में पैदा होती थी, बनती थी, हमें उनका व्यवस्थित उपयोग आता था, उनमें से मुख्य खाना, कपड़ा, रहने की जगह, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति जीवन हमारे यहाँ के सब लोगों को उपलब्ध रहा है, यह हम भूल गये दिखते हैं। इस तरह की भूलें तो हमारे यहाँ पिछले पचास बरस से शुरू हुई, और अब तो हम सब पढ़े लिखे, अच्छे खाते पीते, किसी भी दल व सम्प्रदाय व वाद के हों, इन भूलों को सत्य वाक्य जैसे मानने लगे हैं। हममें वैसे पराये के लिये कोई प्रेम व निष्ठा नहीं पैदा हुई लेकिन यह जरूर हो गया है कि हमें अपने और पराये (व्यक्ति, व्यवस्था, तकनीक, विज्ञान) में जो भेद होते हैं वह
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समझ में नहीं आते। स्वदेशी के प्रचार में जो लोग आज लगे हैं उनमें से अधिकांश
को भी नहीं।
यह ऊपर जो कहा गया है वह अधिकांशतः तो हमारे 200-250 बरस
की दासता का परिणाम है, और पिछले 50 बरस में हमारे ऊपर जो बाहर का
बढ़ता दबाव है उससे इसका भारतव्यापी विस्तार हुआ है। हम समझ कर और
लगकर प्रयत्न करते तो उसमें से निकल आते। लेकिन इन 30-40-50 बरसों
की हमारी सोच और कार्य हमारे पर और एक नई विपत्ति ले आये हैं। देखने में
जो विपत्ति आई है वह वैसे तो 12-14 बरस पुरानी ही है लेकिन उसका आरंभ
व जड़ें तो यह जो हमारा संविधान है जिसको हमने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से
सीखा और उधार लिया, उसमें है।
अंग्रेजों ने 300-400 बरस पहले क्रोमवेल के मध्य सत्रहवीं शती के
समय से अपने यहां दो दलों को लेकर राज्यव्यवस्था बनानी शुरू की। वह
कमोबेश अभी भी अंग्रेजों के यहाँ चलती है। समय चलते चलते कोई और नया
दल बनता है – जैसे कि 18 वीं सदी के अन्त में ब्रिटिश लेबर पार्टी बनी, तो
पुरानों में से एक दल क्षीण पड़ जाता है जैसे कि विग व लिबरल क्षीण हुए।
लेकिन ब्रिटेन एक छोटा देश है, उत्तर प्रदेश से भी क्षेत्रफल में छोटा और आबादी
में तो आधा ही। दूसरे, राजनैतिक दल ही ब्रिटेन के लोगों के मुख्य संरक्षक व
सहारा नहीं हैं। ब्रिटेन में पचासों ईसाई सम्प्रदाय हैं जिनसे अलग अलग लोग,
पूरे मुहल्ले व गाँव भी सम्बंधित हैं। फिर वहाँ के पुराने धनवान और शक्तिशाली
लोगों की क्लबें हैं, जहाँ देश की स्थिति पर विचार होता रहता है और अक्सर
बड़े-बड़े फैसले भी ऐसे स्थानों पर होते हैं। यह जरूर है कि यह दो व तीन
राजनैतिक दलों का बारी बारी से सरकार चलाने का तरीका ब्रिटेन से अमरीका,
यूरोप व जापान तक गया है। लेकिन अमरीका इत्यादि में इस तरीके को अपनी
तरह से समझा गया है, खपाया गया है, और जहाँ वह नहीं खप पाया जैसे
दक्षिण अमरीका व अफ्रीका के देशों में, वहाँ जब तब डिक्टेटरशिप चलती ही है।
पिछले पचास बरस में हमारी राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक स्थिति
दक्षिण अमरीका व अफ्रीका के देशों जैसी होने लगी है। भारत की लोक सभा व
राज्यसभा, और प्रदेशों की विधानसभायें भी कंकाल जैसे होती जा रही हैं।
हमारा 'स्टील फ्रेम' कहा जाने वाला अंग्रेजों का दिया तंत्र व ढांचा भी अब
शक्तिहीन ही है, उसके बस का अब लोगों को बराबर भयभीत कर लेना नहीं है
जो कि ब्रिटिश समय में उसका मुख्य काम था, लेकिन लोगों के रास्ते में बाधायें
कायम करना तो अभी तक जारी है ही। इस राजनीतिक व्यवस्था और शासन
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तंत्र की एक बड़ी देन है कि उसने देश के लोगों को बांट दिया है, परिवार-परिवार
में व्यक्तियों को बांट दिया है, मोहल्लों-मोहल्लों में, गांव-गांव में। जिससे
भारत के 10 से 15 प्रतिशत लोग तो सरकारी व्यवस्था के खंबे बन गये हैं, और
बाकी 85 से 90 प्रतिशत निरूत्साहित, कंगाल और साधनहीन। देश का
मुहल्ला-मुहल्ला, गाँव-गाँव, नगर-नगर बंट चुका दिखता है। बंटना तो अंग्रेजों
के समय में ही आरंभ हो गया था, लेकिन हम उसे अब पूरा करने में लगे दिखते
हैं।
इस तरह के टूटने की एक भयंकर शुरूआत दिल्ली के सांसदों और
विधान सभा के सदस्यों को लेकर ही शुरू हुई। बहाना रहा कि दो, चार, छः
सदस्य जिन्हें आयाराम-गयाराम नाम दिया गया, एक राजनैतिक दल छोड़कर
दूसरे दल में जाते रहते हैं, और दलबदल होता रहता है, और इसमें धन व पद
का लालच भी काम करता है। यह दलबदल कोई नई बात नहीं है। हजारों वर्षों
से यह जहाँ तहाँ होता ही रहता है। इसके अलग-अलग इलाज भी होंगे। ब्रिटेन
में तो जो पार्लियामेंट के सदस्य अपने दल के साथ मत नहीं देते, उन्हें दल से
नहीं निकाला जाता, लेकिन उनका सामाजिक बहिष्कार जैसा होता है, लेकिन
हमारे विद्वान राजनितिकों व उनके सलाहकारों ने तय किया कि जो सदस्य हर
तरह से साथ नहीं देता, उसको न केवल दल से ही निकाल दिया जाये बल्कि
उसका फौरन ही राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी समाप्त कर दिया जाये। वैसे जो
सदस्य सांसद या विधायक बनता है वह अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि होता है, न कि
किसी दल का भृत्य। उसको डांट – फटकार व हुक्म देने का अगर किसी को
अधिकार है तो उसके क्षेत्र को न कि किसी राजनीतिक दल को। दल में वो
स्वायत्त ही आया है, और दल ठीक-ठाक चलता है, न्याय करता है तो वो
साधारणतः उसमें रहेगा ही। उसका किसी कारणवश विचार या ध्येय बदलता
है तो वो तो उसका क्षेत्र ही संभाल सकता है।
लेकिन हमने तो ब्रिटिश राज्य के शुरू से ही यहां के समाज और लोगों
के रास्ते में रुकावटें डालना ही सीखा है, या कानूनों के छिद्र बंद करना।
रुकावटें डालने या छिद्र बंद करने का परिणाम यह हुआ कि यह देश फिर से
क्रमशः आलस्य से भर गया और यहाँ की परस्परिकता ओझल – सी हो गयी।
वैसे तो आज का सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक ढांचा
इन 200–150 वर्षों में, या और पहले से ही, जर्जर होता गया है, लेकिन पिछले
8–10 बरसों से भारत का जो बेहाल हुआ है उसका मुख्य कारण सांसदों को
दल का भृत्य व कैदी जैसा बना देना है। वैसे भारत का संविधान और उसकी
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संसद, विधान सभायें इत्यादि तो मूलतः दोबारा बनानी ही होंगी, लेकिन जब तक
यह सब नया ढांचा बने तब तक कुछ कदम तो उठाने ही पड़ेंगे। उनमें एक कदम
तो सांसद इत्यादि को स्वतंत्र कर देना और उनको उनके क्षेत्रों से जोड़ देना
होगा। दूसरा कदम, यह आवश्यक है कि संसद, विधानसभा इत्यादि जितने
वर्षों के लिये चुनी जाये, उतने वर्ष अवश्य चले। सरकार की किसी विषय पर
बात नहीं मानी जाय तो ऐसा होना हर समय उसकी हार नहीं मानी जानी
चाहिये। बात नहीं माने जाने का मतलब है कि वह अपना रास्ता बदले। उससे
फिर भी काम न चले तो उसी संसद व विधानसभा में से दूसरी व तीसरी सरकार
बन जाय। देश को साधारणतः व्यवस्थित रखना और प्रजा को अभय जैसा रहे,
यह संविधान का, संसद का, विधानसभाओं का और राजनीतिक गिरोहों का
प्रथम काम है।
अखिल भारतीय राजनीतिक गिरोहों का या दूसरे वैज्ञानिक, आर्थिक,
व्यावसायिक गिरोहों का दबदबा व झूठी प्रतिष्ठा जितनी भी कम हो उतना देश
के लिये अच्छा है। क्षेत्रों की देखभाल तो प्रदेश ही कर सकेंगे और प्रदेश मिलकर
ही भारत को संभाल सकेंगे, सुव्यवस्थित रख सकेंगे, समृद्धि दे सकेंगे और विश्व
के परिप्रेक्ष्य में शक्तिशाली और बराबर का रख सकेंगे। भारतीय केंद्र व्यवस्था
से यह कभी होने का नहीं है, यह तो एक प्रवंचना है। केंद्र तो प्रदेशों का संघ ही
चला सकेगा, और ऐसा संघ ही तय कर सकेगा कि केन्द्र को कौन - कौन काम
सौंपे जायें, क्या-क्या साधन उसे उपलब्ध कराये जायें।
प्रदेशों में भी आज की राजनीतिक व अन्य संस्कृति उसे दिशा देती है
व और दूसरी सभ्यताओं से कैसा संबंध बनाये, यह बताती है। यह अवश्य है कि
हमें शक्तिशाली होने की आवश्यकता है। लेकिन शक्ति तो कई तरह से बनती
है, केवल हावी व लुटेरे लोगों के रास्ते से ही नहीं। इस पर ध्यान देना हमारे
विद्वानों व मनीषियों का काम है।
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