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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 858

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मुमुक्षुसंहिता

[ अ० ६४ ]

में संचित पित्त को तित्त धृतों के पीने से, युक्तिपूर्वक रक्तमोक्षण से, विरेचनों से निकाले। तीक्ष्ण अम्ल, उष्ण, क्षार दिन में सोना, धूप इनसे बचे। रात्रि में जागना, मैथुन भी छोड़ देवे।

(मधुर-शीतल जल गंध (मेघावर्षक)। पवित्र, स्फटिक के समान निर्मल, शरद ऋतु के चन्द्रमा की किरणों से धुला, अगस्त्य के निकलने से निर्बिष बना निर्मल होने के कारण सब जल इसमें हितकारी है। चन्दन कपूर से सुगन्धित करके, निर्मल लघु कपड़े पहिने। शरद ऋतु के फूलों की माला पहने और युक्ति से सीधु की पीये। पित्तनाशक जो भी हो, उन सब का सेवन करे।) वक्तव्य—हंसोदक—

दिव्या सूर्याशुसंतप्तं निधि चन्द्रांशुशीतलम् ।
कालेन पक्वं निर्दोषमगस्त्येनाविषीकृतम् ॥
हंसोदकमिति ख्यातं शारदं विमलं शुचिं ।
स्नानपानावगाहेषु हितमस्वु यथाऽमृतम् ॥
शारदानि च माल्यानि वासांसि विमलानि च ।
शरत्काले प्रशस्यन्ते प्रदोषे चन्द्ररश्मयः ॥१३-२०॥
(हेमन्तः शीतलो रूः) मन्दसूर्योऽनिलाकुलः ॥२१॥
ततस्तु शीतमासाद्य वायुस्तत्र प्रकृप्यति ।
कोष्ठस्थः शीतसंस्पर्शादनतःपिण्डीकृतोऽनलः ॥२२॥
रसमुच्छोषयत्याग्न्य तस्मात् स्निग्धं तदा हितम् ।)
हेमन्ते लवणक्षारतित्तकाम्लकटुकोक्तटम् ॥२३॥
ससर्पित्तैलमहिममशनं हितमुच्यते ।
तीक्ष्णान्यपि च पानानि पिवेदगुरुभूषितः ॥२४॥
तैलाकृतस्य सुखोष्णो च वारिकोष्ठेऽवगाहनम् ।
साक्षारयाने महति कौशेयास्तरणस्तृते ॥२५॥
शयोत जयने तैस्तैर्धृतो गर्भगृहोदरे ।
स्त्रीः शिल्प्याऽगुरुधूपाद्याः पीनोरुजघनस्तनीः ॥२६॥
प्रकामं च निषेवेत् मैथुनं तर्पितो नृपः ।
(मधुरं तित्तकटुकमम्लं लवणमेव च ॥२७॥
अन्नपानं तिलान् माषाण्डाकाणि च दधीनि च ।
तथेच्छुविकृतीः शालीन सुगन्धाश्च नवानपि ॥२८॥
प्रसहानूपमांसाणि क्रव्याद्विलशाधिनाम् ।
औदकानां प्लवानां च पादिनां चोपसेवयेत् ॥२९॥
मद्यानि च प्रसन्नानि यत्तु किञ्चिद् बलप्रदम् ।
कामतस्तन्निषेवेत् पुष्टिमिच्छन् हिमागमे ॥३०॥
दिवारुच्यन्मजीर्णं च वज्येतत्र यत्नतः ।)
एष एव विधिः कार्यः जिगिरे समुदाहृतः ॥३१॥

(हेमन्त ऋतु शीतल, रूख, सूर्य का तेज मन्द, वायु की अधिकतावाली होती है। इस ऋतु के शीतल होने से इस ऋतु में वायु कुपित होता है। शीतस्पर्श के कारण जाठराग्नि अन्दर में पिण्डीभूत—एकत्रित हो जाती है, इससे वह रस को सुखाती है, अतः स्निग्धभोजन इस ऋतु में हितकारी है। हेमन्त ऋतु में प्रबल लवण-तित्त-क्षार-अम्ल-कटु रसों का, प्रखुर

धी तैल का तथा उष्ण भोजन का सेवन हितकारी है। शरीर पर अगर का लेप करके तीक्ष्ण पानों को (पेयों को) पीये। शरीर पर तैल की मालिश करके गरम पानी से भरे टब में स्नान करे। अंगारों से भरी अंगीठीवाले, घर में बड़े विस्तृत देशम से विछाये विस्तर पर शीतको मिटानेवाले वस्त्रों को ओढ़कर गर्भगृह के अन्दर सोये। अगर और धूप से भरी, उरु, जघन एवं स्तनवाली स्त्रियों का आलिंगन करके वाजीकरण खान-पान से तुरंत हुआ राजा इच्छानुसार मैथुन करे। (मधुर तित्त कटु, अम्ल, लवण, खान-पान, तिल, माष, शाक, दही, गन्ने के रस से बने पदार्थ, सुगन्धित नवीन शालिषान्य, प्रसह-आनूपमांस, मांस खानेवाले एवं विलेश्यों का मांस, औदक (मछली आदि) मांस, प्लव (बत्तख आदि) आदि का मांस, कल्लुए आदि पादियों का मांस खाये। निर्मल स्वच्छ मद्य पीये। और जो भी बलप्रद हो, उसको हेमन्तऋतु में इच्छापूर्वक खाये, दिन में सोना, अजीर्ण, इनको प्रयत्न पूर्वक छोड़ देवे।) शिशिर में यही विधि बरते।

वक्तव्य—“प्रावराजिनकीशयप्रवेणीकुथकास्ततम्—” ये वस्त्रों के भेद हैं, जो कि गरम होते हैं।

“वज्येदन्तपानानि लघूनि वातलानि च ।
प्रवातं प्रमिताहारमुदमर्थं हिमागमे” ॥चरक ॥२१-३१॥
(हेमन्ते निचितः श्लेष्मा शैत्याच्छीतशरीरिणाम् ।
औषध्याद्वासनते कुपितः कुतृते च गदान् बहुन् ॥३२॥
ततोम्लमधुरस्निग्धलवणानि गुरुणि च ।
वज्येद्वृमनादीनि कर्माण्यपि च कारयेत् ॥३३॥
षष्ठिकान् यवाच्छीतान् मुदगान् नीवारकोद्रान् ।
लावादिबिष्कररसेर्दद्याद्युषेभ्र युक्तिः ॥३४॥
पटोलनिम्बवार्ताकतिक्तकैश्च हिमाग्ये ।
सेवेन्मध्वासवारिष्टान् सीधुमाध्वीकमाधवान् ॥३५॥
व्यायाममञ्जनं धूमं तीक्ष्णं च कवलप्रदम् ।
सुखाभ्युना च सर्वाथान् सेवेत् कुसुमागमे ॥३६॥
तीक्ष्णरूक्षकटु क्षारकषायां कोष्णमद्रवम् ।
यबसुदग्धमधुमायं वसन्ते भोजनं हितम् ॥३७॥
व्यायामोऽत्र नियुद्धाध्वशिलानिर्घातजो हितः ।
वस्सादनं तथा स्नानं वनिताः काननानि च ॥३८॥
सेवेत् निर्हरेच्छापि हेमन्तोपचितं कफम् ।
शिरोंविरैकवमनतिरूहकवलादिभिः ॥३९॥
वज्येन्मधुरस्निग्धदिवारुच्यन्गुरुद्रवान् ।

शीतल शरीरवाले पुरुषों में हेमन्त के अन्दर संचित हुआ कफ वसन्त में गरमी से कुपिय होकर बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है। इससे अम्ल, मधुर, स्निग्ध, लवण और गुप्त वस्तुओं का त्याग करे, और वमन-विरेचन आदि कर्मों को