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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 805

अ० ४८ ]

सत्तरेतन्त्रम्

७४९

नाशक, स्निग्ध एवं वातनाशक चिकित्सा हितकारी है ॥७५॥
क्षतजेनाङ्गतश्चान्यः शोचतो वाऽप्यनेकधा ।
तेनान्तर्दह्यतेऽत्यर्थं तृष्णामूर्च्छाप्रलापवान् ॥७६॥
तमिष्टविषयोपेतं सुहृद्भिरभिसंबुतम् ।

क्षीरमांसरसाहारं विधिनाकेन साधयेत् ॥७७॥
रक्त के साथ भोजन करते हुए या अनेक प्रकार से शोक
करते हुए भोजन करने से मनुष्य में दाह होता है । इससे
मनुष्य में बहुत अधिक अन्तर्दह होता है, रोगी को प्यास
मूर्च्छा, प्रलाप होता है । इस में रोगी को अभिलषित विषयों से
युक्त करे, मित्र उसे घेर कर रहें, दूध, मांसरस का भोजन
देकर, दाहशान्तिकर विधि से शान्ति पहुँचाये । ७६, ७७॥

मर्माभिघातजोऽप्यस्ति स चासाध्यतमः स्मृतः ।
सद्यःप्राणहर या कालान्तरं मर्माभिघात से
भी दाह होता है, यह असाध्य कहा है ।

सर्वं एव च वज्र्याः स्युः शीतगान्धेषु देहिषु ॥७८॥
शरीर के ठण्डा हो जाने पर सब दाह असाध्य हैं । मदिरा
रोग से पीड़ित व्यक्ति ठण्डा होने पर असाध्य होता है ॥७८॥

एवंविधो भवेद्यस्तु मदिरामयपीडितः
प्रशान्तोपद्रवै चापि शोधनं प्राप्तमाचरेत् ॥७९॥

तृष्णा, दाह आदि उपद्रव शान्त हो जाने पर दोष के
अनुसार विरोधि विरेचन रोगी को देवे ॥७९॥

सजीरकाण्यार्द्रकश्चङ्कवेर-
सौवर्चलान्यर्थजठरुत्तानि ।
मद्यानि हृद्यान्यथ गन्धवन्ति
पीतानि सद्यः शमयन्ति तृष्णाम् ॥८०॥

जीरा, आर्द्रक, सौठ, सौवर्चल, आधा पानी मिलाये, मन
के प्रिय, सुगन्धित मद्य पीने पर तृष्णा को तुरन्त शान्त करते हैं।
जठरुत्तान् श्रन्दनभूषिताङ्गः

स्त्रवो सभक्तां पिशितोपदंशाम् ।
पिवन सुरां नेव लभेत रोगान्
मनोनुविषन् च मदं न याति ॥८१॥

जल से अंगों को गीला करके (स्नान करके) शरीर पर
चन्दन का लेप लगाके, माला धारण करके, भोजन के साथ
मांस को खाकर, सुरा का पान करने से पानजन्य रोग नहीं
होते, एवं मन को हानि पहुँचानेवाला मेद भी नहीं होता ।

आभिः क्रियाभिः सिद्धान्भिः शमं याति मदात्ययः ।
न चेन्मद्यविधिं हित्वा क्षीरमस्य प्रयोजयेत् ॥
लंघनैः पाचनैर्दोषशोधनैः शमनैरपि ।
विमचस्य-कफे क्षोणे जाते दौर्बल्यलाघवे ॥
तस्य मद्यविदग्धस्य वातपित्ताधिकस्य वा ।
श्रीष्मोपतसस्य तरोर्यथा वर्षं तथा पयः ॥

पयसाऽभिदृते रोगे बले जाते निबर्त्तयेत् ।
क्षीरप्रयोगं मद्यं च क्रमेणाल्हात्मनाचरेत् ॥
विधिना मात्रया काले हितैरन्तेः यथावलम् ।
प्रहृष्टो यः पिवेनमद्यं तस्य स्यादमृतं यथा ॥

चरक चि० अ० २४-१९५,६८ ॥८२॥
इति श्रीशुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे
पानाल्यप्रतिषेधो नाम (नवमोऽध्यायः आदितः)
सप्तत्वारिशत्तमोऽध्यायः ॥४७॥

अष्टचत्वारिशत्तमोऽध्यायः

अथातस्तृष्णाप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे तृष्णा प्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान
करेंगे-जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

सततं यः पिवेद्भारि न तृप्तिमधिगच्छति ।
पुनः काङ्क्षति तोयं च तं तृष्णादितमादिशेत् ॥३॥

तृष्णा का स्वरूप-जो मनुष्य निरन्तर-लगातार पानी
पीने पर भी तृप्ति अनुभव नहीं करता, फिर भी पानों की चाह
करता है, उसे तृष्णा से पीड़ित जाने ॥३॥

संक्षोभशोकश्रममद्यपाना-
द्रक्षाम्बुजुष्कोष्णकटूपयोगात् ।
धातुक्षयारुल्लङ्घनसूयतापात्

पित्तं च वातश्च भृशं प्रवृद्धौ ॥४॥
क्षोतासि सन्दूषयतः समेतौ
यान्यम्बुवाहीनि शरीरिणां हि ।

क्षोतःस्वप्नो बाहिषु दूषितेषु
जायेत तृष्णाऽतिबला ततस्तु ॥५॥

अतिशय विशेष, शोक, श्रम, मद्यपान, रूक्ष, अम्ल, शुष्क,
उष्ण-ऋटुरस के सेवन ते, धातुओं के क्षय से, लंघन से, सूर्य
की गरमी से, पित्त और वायु अतिशय बढ़कर एक साथ मिल-
कर मनुष्यों के जलवाही क्षोतों को दूषित करते हैं । जलवाही
क्षोतों के दूषित होने से अतिबलवान् तृष्णा उत्पन्न होती है ।

पित्तानिलो प्रवृद्धो सोम्यान् धातुं श्च शोषयतः ।
रसवाहिनीश्च धमनीर्जिह्वामूलगलतालुक्कल्लोभः ॥

नास्ति विना हि तपः पवनाद्वा तौ हि शोषणे हेतु ।
अन्ध्यातोस्तद्विद्वान्वाप्यं क्षये तृष्यते नरो हि ॥

गुर्वत्तपयःस्नेहैः संमूर्च्छन्दिः विदाहकाले च ।
यस्तुष्येद्दृष्टमागं तत्राप्यनिलानलो हेतु ॥ च० ॥४,५॥

तिक्ष्णः स्मृतास्ताः क्षतजा चतुर्थी
क्षयात्तथाऽन्याऽऽमसमुद्भवो च ।

स्यात् सममी भक्षन्तिमित्ताजा तु
निबोध लिङ्गान्यनुपूर्वशस्तु ॥६॥