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सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 705

अ० २२ ] ८२

उत्तरतन्त्रम्

६४८

कुमिर्णं में कुमिनाशक चिकित्सा करे ।
वार्ताकुधूमरुच हितः सार्धपस्तेह एव च
सूखी बड़ी कटेरी का धुंवा कान में देना या सरसों का तेल
कान में डालना उत्तम है ॥ ५१ ॥

कुमिर्णं हरितालेन गवां मूत्रयुतेन च ॥५२॥
गुग्गुलोः कर्णदौर्गन्ध्ये धूपनं श्रेष्ठमुच्यते
छर्दनं धूमपानं च कबलस्य च धारणम् ॥५३॥
गोमूत्रं में हरताल मिलाकर कान में डालना कुमिनाशक
है । कान की दुर्गन्ध में गुग्गुल का धूपन उत्तम है । वमन,
धूमपान, कबल धारण ये उत्तम हैं ॥५२ ॥५३॥

कर्णच्छेदे हितं तैलं सार्धपं चैव पूरणम् ।
विद्रधौ चापि कुर्वीत विद्रधयुक्तं चिकित्सितम् ॥५४॥
कर्णच्छेद में सरसों का तेल भरना उत्तम है । कर्ण विद्रधि
में विद्रधि में कही चिकित्सा करे ॥५४॥

प्रकलेद्य धीर्मास्तैलेन स्वेदेन प्रबिलाप्य च ।
शोधयेत्कर्णवित्कं तु भिषक् सस्यक् शलाकया ॥५५॥
वैद्य कर्ण मेल को तेल से गीला करके, स्वेद से पिघलाकर,
शलाका से बाहर निकाले ॥५५॥

नाडीस्वेदोऽथ वमनं धूमो मूर्धबिरेचनम् ।
विधिश्व कफहृत्सर्वः कर्णकण्डुमपोहति ॥५६॥
नाडीस्वेदन, वमन, धूमपान, शिरोविरेचन, और कफ-
नाशक सब विधि-कर्णकण्डु को नष्ट करती है ॥५६॥

अथ कर्णप्रतीनाहे स्नेहस्वेदौ प्रयोजयेत् ।
ततो विरिक्तशिरसः क्रियां प्राप्तां समाचरेत् ॥५७॥
कर्णप्रतीनाह में स्नेह और स्वेद बरते । शिरोविरेचन देकर
जो उचित चिकित्सा हो वह करे ॥५७॥

कर्णपाकस्य भेषज्यं कुर्यात्पित्तविसर्पवत् ।
कर्णपाक की चिकित्सा पित्त विसर्प की भांति करे ।
कर्णच्छिद्रे वर्तमानं कोटं क्लेदमलादि वा ॥५८॥

शृङ्गणापहरेद्दीमायनथवाऽपि शलाकया ।
कान के छेद में कीड़ा या मल अथवा क्लेद होने पर
इसको सींग से चूसकर या शलाका से बाहर निकाले ॥५८॥
शेषाणां तु विकाराणां प्राक् चिकित्सतमीरितम् ॥५९॥
अर्श, अंबुद, शोफ इनकी चिकित्सा पहले कह दी है ।
वहां पर देख लें ॥

शुष्कामलकशुण्ठीनां क्षारो हिंमुमहोषधम् ।
शतपुष्पा वचा कुष्ठं दारु शिमुरसाजनम् ॥
सौवर्चलयवक्षारस्वजिकोद्विभदसेन्धवम् ।
भूर्जप्रनियविंड मुस्तं मधुशुक्तं चतुर्गुणम् ।
मातुलुङ्गरसश्चैव कदल्या रस एव च ।
सर्वैः पृतेः यथोद्दिष्टैः क्षारतैलं विपाचयेत् ॥
वाषिर् कुमिनादश्च पृथ्वावश्च दारुणः ।
क्रमयः कर्णशूलं च पूरणादस्य नश्यति ॥

चरक ॥५९॥

इति श्री सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गतशलाकयतन्त्रे कर्ण-
गतरोगप्रतिषेधो नामैकविंशोऽध्यायः ॥२१॥

द्वारविशतितमोऽध्यायः

अथातो नासागतरोगविज्ञानीयसध्यायं व्याख्यास्यामः ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२२॥

अब इसके आगे नासागतरोगविज्ञानीय अध्याय का
व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा
था ॥१,२॥

अपीनसः पूतिनस्य नासापाकस्तथैव च ।
तथा शोणितपित्तं च पूयशोणितमेव च ॥३॥
श्वशुश्रुशुशुर्दीप्तो नासानाहः परिस्त्रवः ।

नासाशोषेण सहिता दक्षैकारुचैरिता गदाः ॥४॥
चत्वार्यश्रांसि चत्वारः शोफा सम्राबुंदानि च ।
प्रतिशयायाश्च ये पञ्च वद्यन्ते सचिकित्सिताः ।

एकत्रिंशन्मितास्ते तु नासारोगाः प्रकीर्तिताः ॥५॥
अपीनस, पूतिनसा, नासापाक, रक्तपित्त, पूयरक्त, श्वशु,
श्रंशु, दीप्त, नासनाह, परिस्त्रव, नासाशोष, ये १ नासा रोग

हैं । इनके अतिरिक्त नासाशं ( चार ) नासाशोफ ( चार )
नासाबुंद ( सात ), प्रतिशयाय ( पांच ) भी नासारोग कहे जाते
हैं जो कि चिकित्सा के साथ कहे जायेंगे—ये इकतीस नासारोग
कहे गये हैं ॥३-५॥

आनह्यते यस्य विषुध्यते च
प्रकिलद्यते शृण्यति चापि नासा ।
न वेत्ति यो गन्धरसांश्च जन्तु-
र्जुष्टं व्यवस्थेतमपीनसेन ॥६॥

तं चानिल्लक्षेधमभवं विकारं
ब्रूयात् प्रतिशयायसमानलिंग्गम् ।
जिस मनुष्य की नासा ( श्वास लेते समय ) दकती है,
जलती है, किलन्न रहती है, अथवा सूखी रहती है, जो मनुष्य

गन्ध एवं रसों को ( या केवल गन्ध को ही ) नहीं पहचानता,
उसे अपीनस रोग से युक्त जानना । यह रोग वायु और कफ से
उत्पन्न होता है, इसके लक्षण प्रतिशयाय के समान होते हैं ॥६॥

दोषैर्विदग्धैर्गलतालुमूले
संवासितो यस्य समीरणस्तु ॥७॥
निरेतिपूतिर्मुखनासिकाभ्यां
तं पूतिनस्य प्रवदन्ति रोगम् ।

जिस पुरुष के गले और ताछू मूळ में वायुविदग्ध दोषों से
( रक्त, पित्त, कफ से ) मिलकर उनकी विकृत गन्ध से युक्त
बनकर दुर्गन्धित होकर मुख और नासिका से निकलता है, उस
रोग को पूतिनस ( पूतिनस्य ) कहते हैं ॥७॥