सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १५ ]
स्वेदाभ्यङ्गपरा नित्यं भवेत् क्रोधविवर्जिता ।
पयो वातहरैः सिद्धं दग्नाहं भोजने हितम् ॥२६॥
रसं दग्नाहं शोते तु यथायोगमुपाचरेत् ।
व्युपद्रवां विघ्नां च ज्ञात्वा च वरवर्णनीतम् ॥२७॥
ऊर्ध्वं चतुर्भ्यो मासेभ्यो विस्त्रेजैतं परिहारतः ।
पिप्पली, पिप्पलीमूलं, सोंठ, हलायची, हींग, भागी, अज-
वायन, वन्धु, अतीस, रास्ता, राल, चन्धु, इनका चूर्ण करके
घृत के साथ पिलाये, जिससे दोषों का बहाव हो और वेदना
की शान्ति हो । अथवा स्नेह रहित इनका क्वाथ या कल्क देवे ।
सागौन की छाल, हींग, अतीस, पाठा, कुटकी, तेजबल, इनको
वैद्य घी के साथ, या बिना घी के क्वाथ, या कल्क के रूप में
तीन दिन, पाँच दिन या सात दिन पिलाये । पीछे से स्नेह
फिर पिलाये । निर्मल आसव या सुसंस्कृत अग्नि पिलाये ।
शिरीष और अर्जुन का सिद्ध जल पीने में उत्तम है । जो दूसरे
उपद्रव हों, उनकी दोषों के अनुसार अपनी अग्नी चिकित्सा
करे । सम्पूर्ण रूप से शुद्ध होने पर स्निग्ध एवं थोड़ा भोजन
करे, नित्य स्वेद एवं स्नेह की मालिश करे, क्रोध न करे, सौफ
भादि वातहर द्रव्यों से सिद्ध दूध दस दिन तक भोजन में दे ।
दस दिन तक मांखरस दे, शेष दस दिन में जैसा ठीक हो,
वैसा भोजन दे । उपद्रव रहित, विशुद्ध होने पर एवं रंग निखर
आने से, चार मास के पीछे परहेज पालना छोड़े ॥२०-२७॥
योनिस्मन्तर्पणोऽङ्गे पाने बस्तिषु भोजने ॥२८॥
बलातैलमिदं चास्ये दद्यादनिळवारणम् ।
बलामूलकषायस्य दग्धमूलीश्रुतस्य च ॥२९॥
यवकोलकुकुलस्थानां क्वाथस्य पयसस्तथा ।
अष्टावष्टौ शुभा भागास्तैलादेकस्तदेकतः ॥३०॥
पचेदावाप्य मधुरं गणं सैन्धवसंयुतम् ।
तथाऽगुरुं सर्जरसं सरलां देवदारुं च ॥३१॥
मण्डिजघां चन्दनं कुष्ठमेलां कालानुसारिषाम् ।
मांसीं श्लेयकं पडां तगरं सारिवां वचाम् ॥३२॥
शतावरीमश्वगन्धां शतपुष्पां पुनर्त्तवाम् ।
तत साधुसिद्धं सौवर्णं राजते सुन्मयेऽपि वा ॥३३॥
प्रक्षिप्य कलशे सम्यक् स्वनुगुप्तं निधापयेत् ।
बलातैलमिदं ह्यातं सर्वं वातविकारनृतम् ॥३४॥
यथाबलमतो मात्रां लूतिकायै प्रदापयेत् ।
या च गर्भार्थिनी नारी क्षीणशुक्रश्च यः पुमान् ॥३५॥
वातक्षीणे मर्महते मथितेऽभिहते तथा ।
भग्ने श्रमाभिपन्ने च सर्वथैवोपयुज्यते ॥३६॥
एतदोक्षोपकादीन् वै वातव्याधीनपोहति ।
हिको कासमधीमन्थं गुल्मं श्वासं च दुस्तरम् ॥३७॥
वण्मासानुपयुज्यैतदन्तर्बुद्धिमपोहति ।
प्रत्यमधातुः पुरुषो भवेच्च स्थिरयौवनः ॥३८॥
राज्ञामेतद्वि कर्तव्यं राजमात्राश्च ये नराः ।
सुखिनः सुकुमारान्श्च धनिनश्चापि ये नराः ॥३९॥
योनि के सन्तर्पण में, अभ्यंगमें, पीने में, बस्ति में, भोजन में,
निम्नलिखित बला तैल बरतना चाहिए । यह वायु को नष्ट करता
है । तैल एक भाग, बलामूल का क्वाथ, दशमूल का क्वाथ,
जो वेर, कुलथी का क्वाथ, और दूध, प्रत्येक आठ भाग, इन
सबको मिलाकर पकाये । इसमें कल्कद्रव्य—काकोल्थादि मधुर-
गण, सैन्धव, अगुरु, राल, देवदारु, मजीठ, चन्दन, कूठ,
हलायची, कालानुसारी, जटामांसी, श्लेयक (छडीला), तेजब,
तगर, सारिवा, वन्धु, शतावरी, असगन्ध, सौफ, पुननवा, इनका
कल्क (स्नेह से चतुर्थांश) मिलाकर पकाये । भली प्रकार सिद्ध
हो जाने पर इसको छानकर सोने, चाँदी या मिट्टी के ढड़े में
भरकर, सुरक्षित रख देवे । यह बला तैल सब प्रकार के वात
रोगों को नष्ट करता है । इसकी मात्रा को बल के अनुसार
सूतिका को देवे । अथवा जो स्त्री गर्भ की चाह रखती हो,
जिस मनुष्य का शुक्र क्षीण हो गया हो, उसे दे । वायु से क्षीण,
मर्म पर चोट लगे, मथित चोट लगे, टूटे, थकान से पीड़ित,
व्यक्तियों में सब प्रकार से बरते । यह तैल आन्त्रेप आदि वात
रोगों को नष्ट करता है । हिचकी, कास, अधिमन्थ, गुल्म,
भयानक श्वास को नष्ट करता है । छै मास के उपयोग से
अंबवृद्धि नष्ट हो जाती है । इस तैल से पुरुष नूतन रसादि
धातुओंवाला, स्थिर यौवन होता है । यह तैल राजाओं के
लिये या जो राजाओं के समान वैभवशाली हों, उनके लिये
बनाना चाहिये । जो सुखी, कोमल प्रकृति एवं धनी हों, उनके
लिये भी बनाये ॥२८-३९॥
बलाकषायपीतेभ्यस्तिलेभ्यो वाऽप्यनेकशः ।
तैलमुत्पाद्य तत्क्वाथश्रुतपाकं कृतं शुभम् ॥४०॥
निवाते निश्चतागारे प्रयुज्जीत यथाबलम् ।
जीर्णोऽस्मिन् पयसा स्निग्धमशनीयात् षष्ठिकौदन्तम् ॥
अनेन विधिना द्रोणमुपयुज्यान्नमीरितम् ।
मुञ्जीत द्विगुणं कालं बलवर्णीन्वितस्ततः ॥४२॥
सर्वपौषैर्विनिमुक्तः शतायुः पुरुषो भवेत् ।
शतं शतं तथोक्तर्षो द्रोणे द्रोणे प्रकीर्तितः ॥४३॥
अथवा तिलों को बला क्वाथ से बहुत बार (इककीस बार)
भावित करके, इन तिलों से तैल निकाल लें । इस तैल को
बला क्वाथ से एक सौ बार सिद्ध करे (प्रत्येक बार नया ही
बला क्वाथ ले ) । इस शतपाकी बला तैल को वायु रहित,
एकान्त घर में बल के अनुसार बरते । इसके जीर्ण होने पर
साठी के चावलों को दूध के साथ खाये । इस विधि से इस
तैल की एक द्रोण मात्रा का उपयोग करके, कहे हुए अब को
दुगने समय तक खाये । इस प्रकार करने से बल-वर्ण से युक्त
होकर, सब पापों से (रोगों से) मुक्त होकर एक सौ वर्ष की