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सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 501, कुल 872 में से

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पृष्ठ 501

अ १४]

चिकित्सास्थानम्

४४५

पयसा सरलदेवदारुचित्रकं वा, (मु) सुरङ्गीशालपर्णश्या-
मापुननैवाकलकं वा, ज्योतिष्कफलतैलं वा क्षीरेण
स्वजिकाहिङ्गुमिश्रं पिबेत्, गुडद्वितीयां वा हरीतकीं
सक्षयेत्, स्तुहीक्षीरभावितानां वा पिप्लीनां सहस्रं
कालेन पथ्याकुष्णाचूर्णं वा स्तुहीक्षीरभावितामुत्कारिकां
पर्कां दापयेत्; हरीतकीचूर्णं प्रस्थमाढके घृतस्यावाप्या-
क्षीरेणभिविलाप्य खजेनाभिमध्यानुगुप्तं कृत्वाधर्ममासं
यवपल्ले वासयेत्, ततश्चोद्दृष्ट्य परिष्कान्य हरीतकीकवा-
थाम्लदधीन्यावाप्य विपचेत् तद्यथायोगं मासमधर्मासं वा
पाययेत्; गः पयसि महावृक्षक्षीरमावाप्य विपचेत्,
विपर्कं चावतार्य शीतीभूतं मन्यानेनाभिमध्य नवनीतमा-
दाय भूयो महावृक्षक्षीरेणैव विपचेत्, तद्यथायोगं मासं
मासार्धं वा पाययेत्; चव्यचित्रकदन्त्यतिविषाकुष्ठसारि-
वात्रिफलाजमोदाहरिद्राशङ्खित्त्रिघृतत्रिकुटानामधर्का-
षिका भागा राजवृक्षफलमञ्जाष्टी कर्षाः महावृक्षक्षीर-
पले द्वे, गवां क्षीरमूत्रयोरष्टावष्टी पलानि, एतत् सर्वं घृत-
प्रथे समावाप्य विपचेत्, तद्यथायोगं मासमधर्मासं वा
पाययेत्; एतानि तिल्वकघृतचतुर्थानि सर्पाण्युदरगुल्मवि-
द्रव्यघोलानाहकुष्ठोन्मादापरमारेपूपयोज्यानि विरेचनार्थं;
मूत्रासवारिष्टसुराश्राभीर्दण् महावृक्षक्षीरसंभूताः सेवेत;
विरेचनद्रव्यकर्षायं वा श्रृङ्गवेरदेवदारुप्रगाढम् ॥१०॥

इसके आगे सामान्य योगों को कहेंगे—तद्यथा एरण्ड तैल
को प्रतिदिन मूत्र के साथ या दूध के साथ एक मास या दो
मास तक पीये, इस बीच में पानी न पीये। सात दिन भैंस के
मूत्र को दूध के साथ निराहार रहकर पीये। अन्न और जल
छोड़कर ऊंटनी का दूध ही पन्द्रह दिन पीये। पूर्वोक्त विधि
(वर्धमान पिप्ली नियम) से पिप्ली का एक मास तक सेवन
करें। दन्ती के तैल को सैन्धव और अजवायन के साथ पीये।
वातशूल में आर्द्रक के एक आदक स्वरस में सिद्ध किया दन्ती
तैल देवे। आर्द्रक रस से सिद्ध किया दूध सेवन करें। और
आर्द्रक के कल्क को अथवा चीड़, देवदारु, चित्रक इनके कल्क
को दूध के साथ सेवन करें। शोभांजन, शालपर्णी, निशोथ,
पुननैवा के कल्क को दूध के साथ पीये। मालकंगनी के तैल
में सर्जक्षार हाँग मिलाकर दूध के साथ पीये। हरङ्ग को गुड़ के
साथ खाये। थोर के दूध में भावित एक हजार पिप्लीयों को
जितने समय में खा सके खाये। हरङ्ग और पिप्ली के चूर्ण
को थोर के दूध में भावित करके उत्कारिका (लपवी बनाकर)
देवे। हरङ्ग का चूर्ण एक प्रस्थ लेकर एक आदक घी में मिला-
कर, अग्नि पर पिप्लीकर, मन्थन दण्ड से मथकर, सुरक्षित
करके पन्द्रह दिन जो के ढेर में रख देवे। फिर निकालकर,
छानकर, हरङ्ग का क्वाथ, खड़ी दही मिलाकर पकाये। फिर
योग के अनुसार एक मास या आधा मास पीये। गाय के दूध
में थोर का दूध मिलाकर पकाये, पक जाने पर उतारकर,

ठण्डा होने पर मथानी से मथकर, मक्खन निकालकर, फिर
इस मक्खन को थोर के दूध से ही पकाये। फिर योग के अनु-
सार एक मास या पन्द्रह दिन पीये। चव्य, चित्रक, दन्ती,
अतीस, कूठ, सारिवा, त्रिफला, अजवायन, हल्दी, शंखिनी,
निशोथ, त्रिकुट, प्रत्येक आधा कर्ष, अमलतास का मूत्रा आठ
कर्ष, थोर का दूध दो पल, गौ का दूध, गौ का मूत्र प्रत्येक
आठ पल, घी एक प्रस्थ, इन सबको एक साथ पकाये। इस
घृत को एक मास या आधा मास खाये। ये तीनों घृत और
चौथा तिल्वकघृत ये सब घृत उदर, गुल्म, विद्रथि, अष्टोला,
आनाह, कुष्ठ, उन्माद, अपस्मार में विरेचन के लिये देने
चाहिये। थोर के दूध से मिलाये, मूत्र, आसव, अरिष्टों को
बहुत बार सेवन करें। त्रिघृतादि विरेचन द्रव्यों का क्वाथ
सौठ, देवदारु का चूर्ण मिलाकर (एक कर्ष मात्रा) पीये।
(एरण्ड तैल प्रतिदिन लेने में मरोड़ा न हो, इसलिये सौठ का
चूर्ण मिला लेना चाहिये)।

वि० मन्तव्य—चिकित्सा करते समय बीच २ में आव-
श्यकतानुसार जिसे उचित समझे उस योग से विरेचन देते
रहना चाहिये। इन योगों में कुछ योग तीव्र एवं कुछ योग
मृदु विरेचन हैं। सरल अर्थात् चीड़ तथा देवदारु का गोन्द
लेना चाहिये ॥१०॥

वमनविरेचनशिरोविरेचनद्रव्याणां पालिका भागाः
पिप्लल्यादिबचादिहरिद्रादिपरिपठितानां च द्रव्याणां
रुद्धणपिष्टानां यथोक्तानां च लवणानां, तत्सर्वं मूत्रगणे
प्रक्षिप्य महावृक्षक्षीरप्रस्थं च मृदुमित्रा अवघट्टयन् विपचे-
दप्रदग्धकल्कं, तत्साधुसिद्धमवतार्य शीतीभूतमक्षमात्रा
गुटिका बर्चयेत्, तासामेकां द्वे तिस्त्रो वा गुटिका बलापेक्षया
मासांश्चिन्धुरो वा सेवेत्, एषाऽऽत्ताहवर्तिक्रिया विशेषेण
महान्याधिपूपयुज्यते (विशेषेण) कोष्ठज्राक्ष क्रमौनप-
हन्ति कासश्वासक्रमिकुष्ठप्रतिशयायारोचकाविपाकोदाव-
तार्क्ष नाशयति ॥११॥

संशोधन संशमनीय अध्याय में कहें वमन द्रव्य (मदन
फलादि), विरेचन द्रव्य (त्रिघृतादि), शिरोविरेचनद्रव्य (विड-
गादि) प्रत्येक एक एक पल, द्रव्य संग्रहणीयध्याय में पठित,
पिप्लल्यादि, बचादि, हरिद्रादि गण के द्रव्य जो मिल सकें
उसको, सब नमक, इनको बारीक पीसकर, सब (आठों) मूत्रों
में घोल दे। इसमें थोर का दूध भी एक प्रस्थ मिलाये। फिर
इस सबको मृदु अग्नि से पकाये, पकाते समय निरन्तर कड़छी
से चलाता जाये। कल्क जलने न पाये। जब भली प्रकार
सिद्ध हो जाये, तब उतारकर, ठण्डा होने पर कर्ष के बराबर
गोली बनाये। इनमें से दो, या तीन गोलियों को बल को
अपेक्षा से तीन या चार महीने खाये। यह आनाहवर्त्ति प्रायः
करके महारोगों में विशेष रूप से (मूत्र के अनुपान से) बरती