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सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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* सुश्रुतविषयानुक्रमणिका *

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
सूत्रस्थान२ वारीरिक रोग ✓६पांचों स्थानों के अध्यायों की संख्या११
प्रथमोऽध्यायः३ मानसिक रोग ✓६सूत्रस्थान के अध्यायों के नाम११
वेदोत्पत्ति अध्याय की व्याख्या१४ स्वाभाविक रोग ✓६निदानस्थान११
औपधेनव आदि ऋषियोंका धन्वन्तरि भगवान् के पास आयुर्वेद-अध्ययन के लिये आना१रोगों का आश्रय ✓६शारीरस्थान१२
धन्वन्तरि भगवान् द्वारा औपधेनव आदि ऋषियों का स्वागत२रोगों का निग्रह ✓७चिकित्सास्थान१२
आयुर्वेद अथर्व वेद का उपांग है२रोगों का संशोधन ✓७कल्पस्थान१३
आयुर्वेद के शल्य आदि ८ अङ्ग३संशमन के दो प्रकार ✓७उत्तरस्थान१३
१ शल्य का लक्षण३चार प्रकार का आहार आचार७शालाक्यतंत्र१३
२ शालाक्य का लक्षण३औषधियों के दो प्रकार७कुमारतंत्र१३
३ कायचिकित्सा का लक्षण३स्थावर औषधियों के चार प्रकार७कायचिकित्सा१३
४ भूतविद्या का लक्षण३जंगम औषधियों के चार प्रकार७भूतविद्या१३
५ कौमारभृत्य का लक्षण३स्थावर औषधियों के चिकित्सा उपयोगी अवयव७तन्त्रभूषण१४
६ अगदतंत्र का लक्षण३जंगम औषधियों के चिकित्सा उपयोगी अवयव७उत्तरतंत्र के नाम का कारण१४
७ रसायनतंत्र का लक्षण३पार्थिव औषधियां८आयुर्वेद के आठ अङ्ग१४
८ वाजीकरण का लक्षण३कालकृत औषधनिरूपण८वैद्यों का राजा से पूजित होने का कारण१४
शल्यशान को मुख्य रखते हुए सारे आयुर्वेद के उपदेश के लिये प्रार्थना४कालकृत औषधप्रयोजन८वैद्यों का राजा से वध किये जाने का कारण१४
औपधेनव आदि का सुश्रुत को प्रश्न करने का अधिकारादेश४शारीरिक रोगों के प्रकोप तथा शान्ति के कारण८शास्त्र को न जाननेवाला वैद्य१४
आयुर्वेदशास्त्र का प्रयोजन ✓४आगन्तुक रोगों के दो प्रकार८आयुर्वेद किस प्रकार पढ़ना चाहिये१५
आयुर्वेद निरुक्ति ✓४पुरुष, व्याधि, औषध, क्रियाकाल की संक्षिप्त व्याख्या९पाठ करने की विधि१५
शल्यतंत्र का प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से अविरोध५चिकित्सा शास्त्र का बीज९अध्ययन के समय शिष्य का कर्तव्य१५
शल्यतंत्र का आदि रूप५सुश्रुतके १२० अध्याय और ५ स्थान९चतुर्थोऽध्यायः
आयुर्वेदतन्त्रों में शल्यतंत्र सर्व श्रेष्ठ५सुश्रुत से लौकिक तथा पारलौकिक दोनों प्रकार का सुख मिलता है९प्रभाषण नामक अध्याय की व्याख्या१५
शल्यतंत्र की प्रशंसा५द्वितीयोऽध्यायःव्याख्या का प्रयोजन१५
आयुर्वेद की गुरुपरम्परा ✓५शिष्योपनयनीय अध्याय का अवतरण९व्याख्या की आवश्यकता१५
भगवान् धन्वन्तरि का आत्मपरिचय५शिष्य परीक्षा९आयुर्वेद से अतिरिक्त अन्य शास्त्रों को जानने का उपाय१६
आयुर्वेद के अधिष्ठानभूत पुरुष का निरूपण५शिष्य की दीक्षा विधि९वैद्य शब्द का अधिकारी१६
व्याधियों का साधारण रूप६आयुर्वेद अध्ययन के अधिकारी१०अन्य शब्दतंत्र१६
व्याधियाँ चार प्रकार की हैं ✓६शिष्य का कर्तव्य१०पंचमोऽध्यायः
१ आगन्तुक रोग ✓६रोगी परिचर्या के लिये उपदेश११अग्निपहरणीय अध्याय की व्याख्या१६
६अनध्याय काल११कर्म के तीन प्रकार१६
६तृतीयोऽध्यायःशस्त्रकर्म के आठ प्रकार१६
६अध्ययन सम्प्रदातीय अध्याय की व्याख्या११शस्त्रकर्म के पूर्व तैयार रखने योग्य उपकरण१७
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