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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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७४ | सूर्य सिद्धान्त
जाय और जोड़ दो यदि इष्ट काल मध्य रात्रि से पीछे आवे । ऐसा करने से ग्रह का
तात्कालिक स्थान निकल आवेगा ।।६७।।
विज्ञान भाष्य—यह स्पष्ट है कि ग्रह का मध्यम स्थान अर्द्ध रात्रि के समय
जो कुछ होता है वह अन्य समय नहीं रहता क्योंकि ग्रह निरंतर चलते रहते हैं।
इसलिए अर्द्ध रात्रि के पहले या पीछे किसी इष्ट समय में किसी ग्रह का मध्यम स्थान
जानने के लिए यह जानना आवश्यक है कि उस समय में ग्रह कितना हट जायगा।
यह बात त्रैराशिक से सहज ही जानी जा सकती है—
६० घड़ी : इष्ट घड़ी :: दैनिक गति : इष्ट घड़ी में गति
∵ इष्ट घड़ी में गति = (इष्ट घड़ी × दैनिक गति) / ६० घड़ी
इसलिए अभीष्ट काल की ग्रह की स्थिति
= अर्द्ध रात्रि की स्थिति ± (इष्ट घड़ी + दैनिक गति) / ६० घड़ी
यदि इष्ट काल अर्द्ध रात्रि के पहले हो तो ऋण का चिह्न रखना चाहिये और
पीछे हो तो धन का चिह्न ।
यह इतना स्पष्ट है कि उदाहरण देकर पुस्तक का आकार बढ़ाने की
आवश्यकता नहीं जान पड़ती ।
भचक्रलिप्ताशीत्यंशैः परमं दक्षिणोत्तरम् ।
विक्षिप्यते स्वपातेन स्वक्रान्त्यंशादनुष्णगुः ॥६८॥
तन्नवांशं द्विगुणितं जीवस्त्रिगुणितं कुजः ।
बुधशुक्राकंर्जाः पातैर्विक्षिप्यन्ते चतुर्गुणं ॥६६॥
एवं त्रिघ्नरन्ध्राकॅरसार्काकी दशाहताः ।
चन्द्रादीनां क्रमादेषां मध्यविक्षेपलिप्तिकाः ॥७०॥
अनुवाद—(६८) अपने पात के कारण चन्द्रमा अपने पासवाले क्रान्ति वृत्त
के विन्दु से अधिक से अधिक २७० कला उत्तर या दक्षिण हट जाता है। (६६)
इसका २/९ भाग वृहस्पति, ३/९ भाग अथवा १/३ भाग मंगल और ४/९ भाग बुध, शुक्र और
शनि अपने अपने पातों के द्वारा हट जाते हैं। (७०) इस प्रकार चंद्रादि छः ग्रहों
(चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, और शनि) के मध्यम विक्षेप २७०, ६०, १२०,
६०, १२०, १२० कलाएं क्रम से हैं । ।।६८-७०।।
विज्ञान भाष्य—पिछले ३३ वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में चंद्रमा के पात
का वर्णन है । चित्र ४ में चंद्र कक्षा और क्रान्ति वृत्त एक दूसरे को काटते हुए