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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 824

मानाध्याय ७६६
इससे जो फल आवे उसका आधा संक्रान्तिकाल से घटाने पर पुण्यकाल का
आरम्भ जाना जाता है और जोड़ने पर उसकी समाप्ति का समय निकल आता है ।
चान्द्र और पितृमान
अर्काद्विनिस्सृतः प्राचीं यद्यात्यहरहश्शशी ।
तच्चान्द्रमानमंशैस्तु ज्ञेया द्वादशभिस्तिथिः ॥१२॥
तिथिः करणमुद्वाहक्षौरकर्मादिसत्क्रियाः ।
व्रतोपवासयात्राणां क्रिया चान्द्रेण गृह्यते ॥१३॥
त्रिंशता तिथिभिर्मासश्चान्द्रः पित्र्यमहस्स्मृतम् ।
निशा च मासपक्षान्ते तयोर्मध्ये विभागतः ॥१४॥
अनुवाद—(१२) चन्द्रमा सूर्य से अलग होकर जो दिन प्रति दिन पूरब की
ओर बढ़ता है वही चन्द्रमान है । इस अंतर के १२ अंशों की एक तिथि होती है ।
(१३) तिथि, करण, विवाह, क्षौर कर्म, मुंडन आदि सब क्रियाएं तथा व्रत, उपवास,
यात्रा आदि चान्द्रमान से निश्चय किये जाते हैं । (१४) तीस तिथियों का एक
चान्द्रमास होता है जो पितरों का एक अहोरात्र समझा जाता है । चान्द्रमास के अंत
में अर्थात् अमावस्या के अन्त में पितरों का मध्याह्न और पक्ष के अन्त अर्थात् पूर्णिमा
के अन्त में पितरों की मध्यरात्रि होती है । इस प्रकार शुक्ल पक्ष की अष्टमी के
आधे भाग से पितरों की रात्रि का आरम्भ और कृष्ण पक्ष की अष्टमी के आधे
भाग से उनके दिन का आरम्भ होता है ।
विज्ञान भाष्य—तिथि के सम्बन्ध में मध्यमाधिकार पृष्ठ ८ और स्पष्टा-
धिकार पृष्ठ २१७ में विशेष चर्चा की गयी है । वहीं पृष्ठ २१८ में करण के सम्बन्ध
में भी बहुत कुछ लिखा गया है। पितरों के मध्याह्न और मध्यरात्रि के बारे में
भूगोलाध्याय पृष्ठ ७६७-६८ देखिये ।
नाक्षत्रमान तथा नक्षत्रानुसार मासों के नाम—
भचक्रभ्रमणं नित्यं नाक्षत्रं दिनमुच्यते ।
नाक्षत्रनाम्ना मासास्तु ज्ञेयाः पर्वान्तयोगतः ॥१५॥
कार्तिकादिषु संयोगे कृत्तिकादि द्वयं द्वयम् ।
अन्त्योपान्त्यौ पञ्चमश्च त्रिधा मामास्त्रयस्स्मृताः ॥१६॥
अनुवाद—(१५) जितने समय में नक्षत्र चक्र का एक भ्रमण पूरा होता है
उसे नाक्षत्र दिन कहते हैं । पूर्णिमा के अन्त में चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसी के
नाम पर मासों के नाम पड़े हैं । (१६) कार्तिक आदि मासों का संयोग कृत्तिकादि