सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश अध्याय
मानाध्याय
(संक्षिप्त वर्णन)
[श्लोक १-२—मानों की संख्या और व्यवहार । श्लोक ३-११—सौर मान
से अहोरात्र, षडशीतिमुख, अयन, विषुव संक्रान्तियाँ; संक्रान्तियों के पुण्यकाल और ऋतु
की गणना । श्लोक १२-१४—चान्द्रमान से तिथि, करण, विवाहादि संस्कार, व्रतोप-
वासादि तथा पितरों के दिन रात का निश्चय । श्लोक १५-१६— नाक्षत्र दिन तथा
नक्षत्रों से चान्द्रमासों के नाम । श्लोक १७ – बृहस्पति के वर्षों के नाम । श्लोक
१८-१६—सावन दिन से यज्ञकाल तथा सूतक आदि का निश्चय । श्लोक २०-२१—
दिव्य, प्राजापत्य तथा ब्रह्ममान । श्लोक २२-२७—उपसंहार । अन्त में बीजो-
पनयनाध्याय के २१ श्लोक हैं जो क्षेपक कहे जाते हैं।
नव मानों के नाम
ब्राह्मं पित्र्यं तथा दिव्यं प्राजापत्यं च गौरवम् ।
सौरं च सावनं चान्द्रमार्क्षं मानानि वै नव ॥१॥
अनुवाद—ब्राह्म, दिव्य, पित्र्य, प्राजापत्य, वार्हस्पत्य, सौर, सावन, चान्द्र
और नाक्षत्र नव कालमान हैं ।
विज्ञान भाष्य — इन शब्दों की व्याख्या आगे आनेवाले श्लोकों में ही दे दी
गयी है इसलिये इस समय अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है ।
व्यवहार में आनेवाले मान
चतुर्भिर्व्यवहारोऽत्र सौरचान्द्रार्क्ष सावनै ।
बार्हस्पत्येन षष्ट्यब्दा ज्ञेया नान्यैस्तु नित्यशः ॥२॥
अनुवाद—इस श्लोक में सौर, चान्द्र, नाक्षत्र और सावन मानों का व्यव-
हार होता है । साठ संवत्सरों की गणना बृहस्पति मान से होती है, शेष चार
मानों का काम नित्य नहीं पड़ता ।
विज्ञान भाष्य—इन पांच मानों की चर्चा मध्यमाधिकार में भी आ
चुकी है ।